हाईकोर्ट ने शासन और निगम के 2012 और 2016 के ध्वस्तीकरण आदेश को निरस्त किया

अंबिकापुर। खरसिया रोड स्थित कुंडला वसुंधरा सिटी के 110 भवनों को हटाने की वर्षों से चली आ रही कार्रवाई को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर के एक ऐतिहासिक फैसले से बड़ा झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने 2017 में कृष्णानन्द सिंह व अन्य एवं छत्तीसगढ़ शासन व अन्य के मामले में 20 अगस्त 2026 को निर्णय पारित करते हुए राज्य शासन द्वारा 04 जुलाई 2012 को पारित निर्माण हटाने संबंधी आदेश तथा उसके आधार पर नगर पालिक निगम, अंबिकापुर के आयुक्त द्वारा 07 दिसंबर 2016 को पारित भवन हटाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले से वसुंधरा सिटी के सैकड़ों भवन स्वामियों और निवासियों को वर्षों से चले आ रहे डर, असुरक्षा और अपने घरों के अस्तित्व पर मंडराते संकट से बड़ी न्यायिक राहत मिली है।

न्यायालय के अभिलेख के आधार पर बिल्डर केएन सिंह व अधिवक्ता संतोष सिंह ने होटल मयूरा में पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि, कुंडला वसुंधरा सिटी का विकास वसुंधरा बिल्डर्स/कॉलोनाइजर द्वारा संबंधित प्राधिकारियों से आवश्यक स्वीकृतियां और अनुमतियां प्राप्त करने के बाद किया गया था। संबंधित भूमि पर आवासीय एवं वाणिज्यिक परिसर विकसित करने की अनुमति प्रदान की गई थी तथा नगर पालिक निगम, अंबिकापुर ने 08 अगस्त 2007 को भवन निर्माण की अनुमति दी थी। बाद में नवीन अनुमति के लिए 01 फरवरी 2011 को आवेदन प्रस्तुत किया गया था। महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि उक्त आवेदन का अंतिम रूप से न तो अस्वीकृत किया गया था और न ही उसका विधिवत निराकरण हुआ था। इसके बावजूद निर्माण को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई आगे बढ़ गई। नगर निगम आयुक्त ने स्वयं 03 अगस्त 2011 के आदेश में लंबित आवेदन तथा भवन निर्माण की स्थिति को संज्ञान में लिया था और जो भवन पूर्णता के चरण में थे, उन्हें पूर्ण करने की अनुमति दी थी। इसके बाद कॉलोनाइजर द्वारा 140 भवनों के संबंध में कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन दिया था। अधिवक्ता संतोष सिंह ने बताया कि, न्यायालय ने माना जब भवन निर्माण के लिए पूर्व में अनुमति दी जा चुकी है और नया आवेदन लंबित है, तो बिना सुनवाई और तथ्यों की अनदेखी कर कठोर आदेश पारित नहीं किया जा सकता। चूंकि 04 जुलाई 2012 का मूल आदेश ही विधि सम्मत नहीं था, उसके निरस्त होने के साथ उस पर आधारित 07 दिसंबर 2016 का नगर निगम का आदेश भी टिकाऊ नहीं रह सकता। अंतत: हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

पूर्व पार्षद आलोक दुबे की भूमिका चर्चा में

मामले में प्रतिवादी आलोक दुबे की भूमिका को लेकर भी याचिकाकर्ताओं की ओर से सवाल उठाए गए। न्यायालय के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बिल्डर केएन सिंह ने बताया कि, आलोक दुबे ने वर्ष 2015 में रिट पीटिशन क्रमांक 1767/2015 दायर की थी, जिसके माध्यम से वर्ष 2012 में पारित निर्माण हटाने संबंधी आदेश के अनुपालन के लिए प्रशासनिक कार्रवाई की मांग की गई थी। उक्त कार्रवाई के बाद न्यायालय द्वारा संबंधित कलेक्टर अंबिकापुर को वर्ष 2012 के आदेश के संदर्भ में आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए और आगे चलकर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई बढ़ी। इसके बाद नगर निगम आयुक्त द्वारा 07 दिसंबर 2016 को प्रभावित भवन स्वामियों के विरुद्ध निर्माण हटाने का आदेश पारित किया गया। इस न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया का प्रत्यक्ष प्रभाव उन परिवारों पर पड़ा जो कुंडला वसुंधरा सिटी में अपने घरों में निवास कर रहे थे। बिल्डर केएन सिंह का तर्क है कि, जब सैकड़ों परिवारों के आशियानों पर संकट मंडरा रहा हो, तब एक जनप्रतिनिधि से प्रभावित नागरिकों की कठिनाइयों को समझने, प्रशासन के समक्ष उनकी समस्या रखने और वैधानिक, व्यवहारिक समाधान की रहती, लेकिन ऐसा सामने नहीं आया।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद भवन स्वामियों में राहत

उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद कुंडला वसुंधरा सिटी के भवन स्वामियों एवं निवासियों में राहत और संतोष का वातावरण है। वर्षों से अपने मकानों के भविष्य को लेकर बनी आशंका के बीच राज्य शासन और नगर निगम के दोनों आदेशों के निरस्त होने को भवन स्वामियों ने महत्वपूर्ण न्यायिक राहत बताया है। याचिकाकर्ता कृष्णानंद सिंह ने कहा कि यह निर्णय केवल व्यक्तिगत मुकदमे की जीत नहीं है, बल्कि उन सभी परिवारों की राहत है जो वर्षों से अपने घरों को लेकर अनिश्चितता और मानसिक तनाव में थे। न्यायालय के निर्णय ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत पुन: स्थापित किया है कि प्रशासनिक प्राधिकारी उपलब्ध महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी करके और प्रभावित नागरिकों को प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए बिना उनके घरों एवं संपत्ति को प्रभावित करने वाली कठोर कार्रवाई नहीं कर सकते। यह किसी व्यक्ति के विरुद्ध निजी संघर्ष नहीं था, बल्कि उन परिवारों के अधिकारों और आशियानों की रक्षा का प्रश्न था, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से अपने मकान बनाए या खरीदे थे।

हाईकोर्ट का निर्णय विधि के शासन की पुनर्पुष्टि

अधिवक्ता संतोष सिंह ने कहा कि, यह निर्णय केवल दो प्रशासनिक आदेशों के निरस्तीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों, प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष प्रशासन और विधि के शासन की महत्वपूर्ण पुनर्पुष्टि है। कुंडला वसुंधरा सिटी के निवासी इस निर्णय को वर्षों से चले आ रहे भय एवं अनिश्चितता पर न्यायिक राहत और अपने आशियानों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण विजय के रूप में देख रहे हैं। पत्रकारवार्ता के दौरान उपस्थित कॉलोनीवासियों ने कहा कि, यह स्थिति जब बनी उस समय धनतेरस का दिन था, और प्रशासन और निगम की कार्रवाई का भय कुछ ऐसा था कि उन्होंने दीवाली नहीं मनाई, बल्कि खून-पसीने की कमाई से खरीदे गए घर को बचाने की चिंता में वे लगे थे।

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