ब्रम्हांड और अंतरिक्ष के प्रति, मानव हमेशा से जिज्ञासु रहा है। वह जितना जानता है उसका भेद उतना ही गहराता जाता है। इंसान की जिज्ञासा ही खोज पर मजबूर करती है, यही मानव का क्रमिक विकास भी है। यह विज्ञान के बूते ही संभव है, जो राष्ट्र जितना संपन्न है, वही इस दिशा में आगे भी है। कभी रूसी, यूरी गागरिन अंतरिक्ष की यात्रा करके आए थे तो कभी अमेरिका से नील आर्मस्ट्रांग चांद पर चहलकदमी कर आया। मंगल तक पहुंचने का जतन हो रहा है। 1980 में स्काई लैब गिरने की दहशत कौन भूल सकता है? कल्पना चावला की शहादत किसे याद नहीं?
इसी अनुसंधान की कड़ी में सुनीता विलियम्स, दुबारा अंतरिक्ष स्टेशन भेजी गई। सीमित दिनों का काम था, 8-10 दिन बाद लौट आना था, मगर ये क्या हुआ? किसी मशीनी गड़बड़ी के कारण वापसी का समय बढ़ता गया यहां तक कि, अनिश्चतता के काले बादलों ने घेर लिया। कब लौटेंगी ये तो छोड़ दीजिए अब तो लौटेंगी या नहीं, सवाल कुछ ऐसे उठने लगे। अमरीकी वैज्ञानिकों की दाद देनी पड़ेगी। भारत सहित दुनिया भर के लोगों की दुआ काम आई, मशीन सुधारने में कामयाबी मिल गई। सुनीता विलियम्स और सहयोगी, सकुशल धरती पर आ गए। मानव कल्याण के लिए जान जोखिम में डालकर, विज्ञान की उन्होंने सेवा की, उन्हें धन्यवाद और बधाई। एक और देखने वाली बात है, नारी का हौसला, उनकी जिजीविशा, कभी उनके चेहरे पर शिकन नहीं देखा गया, जान जाए या कि रहे। मानव के लिए ये बड़े हौसले की बात है और नारी समाज के लिए गर्व की बात है। भारत भी इनके घर वापसी के लिए पलक पांवडे बिछाया था। टीवी मंच पर अलग होड़ सी मची थी, मानो उसे हमने ही अंतरिक्ष पर भेजा था, और सुरक्षित वापस लाया हो।

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