राजेन्द्र ठाकुर (राजू)बलरामपुर। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में एक ऐसा आश्रित ग्राम है, जहां लोगों को अपने घर पहुंचने के लिए हर पल खतरे से जूझना पड़ता है। घनघोर जंगल व पहाड़ के बीच से होते गांव के लोग अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। ऐसे में जंगली जानवरों से सामना होने, पहाड़ों से गिरने का खतरा बना रहता है। आजादी के पहले से बसे इस गांव के लोगों के लिए आज तक सड़क नहीं बन पाई है। मूलभूत सुविधाओं से यहां के लोग वंचित हैं। ऐसा नहीं है कि जिले के नक्शे में बसे इस गांव की जानकारी अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों को नहीं है। गांव में स्वास्थ्य कार्यकर्ता बीच-बीच में आते-जाते हैं। जनप्रतिनिधियों का सिर्फ चुनाव के समय आना और आश्वासन देकर जाना होता है।
बात हो रही है बलरामपुर जिले के जनपद पंचायत बलरामपुर के ग्राम पंचायत खडिय़ा दामर अंतर्गत आश्रित ग्राम बचवार की, जो छह किलोमीटर अंदर घने पहाड़ों के बीच बसा है। इस गांव में लगभग 35 घर हैं, जहां 157 लोग निवास करते हैं। राशन व अन्य सामग्री लेने के लिए इन्हें छह किलोमीटर रास्ता तय करना पड़ता है। ग्रामीण साधु राम का कहना है कि बचवार में कोड़ाकू एवं नगेसिया समाज के लोग निवास करते हैं। घने जंगल के बीच बचवार गांव में इनके पूर्वज आजादी के पहले से निवास करते थे। पीढिय़ां गुजरते जा रही हैं लेकिन गांव तक सड़क नहीं बन पाई है। कुछ जनप्रतिनिधि चुनाव नजदीक आने पर वोट हासिल करने इन तक पहुंचते हैं और यहां रहने वाले लोगों की दुर्गति देख कभी आश्चर्य व्यक्त करते हैं, तो कभी ऐसी उम्मीदों के बोल परोस जाते हैं, जिससे ग्रामीणों को लगता है कि उनके दिन बहुरेंगे, लेकिन चुनाव के पांच साल बीतने के बाद भी उनकी स्थिति जस की तस रहती है।


दूषित पानी पीते हैं ग्रामीण


सरकार एक ओर लोगों के घर-घर तक पानी पहुंचाने का कार्य कर रही है, वहीं बचवार के लोग ढोढी का पानी पी रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया स्वास्थ्य विभाग की टीम या कोई अधिकारी पहुंचा तो ढोढी में ब्लीचिंग पाउडर डाल जाता है, बाद में कोई पूछने वाला नहीं है। ग्राम पंचायत की ओर से इस ढोढी का निर्माण कराया गया है। बरसात के दिनों में यहां का पानी पीने से सर्दी और बुखार की चपेट में लोग आ जाते हैं। बरसात में ज्यादातर वे उबालकर पानी पीते हैं।


पहाड़ चढऩे में लगते हैं दो घंटे


गांव में बच्चों को शिक्षा देने वाले शिक्षक पंकज ने बताया कि दो घंटे में पहाड़ चढ़कर वे बचवार गांव पहुंचते हैं, उतरने में भी उतना ही समय लगता है। यहां स्कूल में 12 बच्चे एवं दो शिक्षक हैं, एक शिक्षक कभी-कभार आते हैं। नदी-पहाड़ से गुजरते गांव पहुंचने वाले पंकज का कहना है सड़क नहीं होने के कारण काफी परेशानी होती है। पहाड़ी इलाका होने के कारण नदी में बाढ़ जैसी स्थिति भी बनती है। जंगली जानवरों का खतरा अलग रहता है। बच्चों के भोजन के लिए राशन का सामान पीठ में ढोकर लाना पड़ता है।


बचवार की लाडली है अल्पना
जमुआटाड़ हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर में एएनएम अल्पना किंडो जुलाई 2021 से यहां पदस्थ है, जो बचवार गांव के लोगों से हमेशा संपर्क में रहती है। ऐसे में वह बचवार गांव की लाड़ली बन गई है। हर परिवार के लोग उसे किसी न किसी रिश्ते से बांध रखे हैं। गांव के ग्रामीण व महिलाएं बिना किसी झिझक के अपनी समस्या उन्हें बताते हैं। काफी कष्टकर मार्ग होने के बाद भी अल्पना इनके बीच स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने पहुंच जाती है। अल्पना ने बताया उच्च अधिकारियों के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग के कार्यकर्ता गांव में पहुंच कैंप लगाते हैं और सभी का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति जागरूक रहें, इसका पूरा प्रयास रहता है।
मेंझरी कोदो मुख्य खेती
बचवार के ग्रामीणों के पास पर्याप्त मात्रा में जमीन है, जिसमें वे धान, मेझरी, कोदो की खेती करते हैं। इससे उनके परिवार का भरण-पोषण होता है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सड़क की सुविधा उन्हें मिल जाए तो रोजगार का साधन भी सुलभ हो सकता है। गांव से सड़क मार्ग तक आने-जाने में बर्बाद होने वाले चार घंटे से उन्हें मुक्ति मिल सकती है।

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