महाप्रबंधक प्रदीप कुमार की निष्क्रियता को लेकर उठ रहे सवाल

भटगांव। एसईसीएल भटगांव क्षेत्र के वर्तमान महाप्रबंधक प्रदीप कुमार व अन्य अधिकारियों की लापरवाही से कई भूमिगत खदान बंद होने के कगार पर हैं। इसे लेकर एसईसीएल भटगांव क्षेत्र के कोयला खदानों में कार्यरत मजदूर चिंतित दिखाई दे रहे हैं और दबे स्वर में कह रहे हैं कि अन्य खदानें बंद हो गई तो उनका क्या होगा। इसे लेकर महाप्रबंधक गंभीर दिखाई नहीं दे रहे हैं। बंद पड़ी कोयला खदानें चालू करने के लिए प्रयास भी नहीं किया गया है।

बंद पड़ी कोयला खदानें और आने वाले समय में बंद होने वाले कोयला खदानों को लेकर चिंतित मजदूर और मजदूर यूनियन के पदाधिकारियों के द्वारा इसे लेकर कई बार पत्र व्यवहार, धरना-प्रदर्शन किया जा चुका है, फिर भी वर्तमान महाप्रबंधक प्रदीप कुमार इसे लेकर गंभीर नहीं हैं। उच्च अधिकारियों को भी तत्संबंध में कई बार पत्र के माध्यम से अवगत कराया गया है। संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण भटगांव क्षेत्र बुरे दौर से गुजर रहा है। उत्पादन में अव्वल स्थान रखने वाला भटगांव कालरी परिक्षेत्र वर्तमान में अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रहा है। बता दें कि भटगांव एसईसीएल क्षेत्र के वर्तमान जिम्मेदार अफसरों की हठधर्मिता ये क्षेत्र की पांच कोयला खदानें बंद हो चुकी हैं। बंद हुई खदानों में क्षेत्र की दुग्गा ओपन कास्ट परियोजना समेत महान एक व महान दो ओपन कास्ट परियोजना, कल्याणी भूमिगत परियोजना व महामाया भूमिगत परियोजना शामिल है। अधिकारियों की निष्क्रियता के परिणामस्वरूप बंद कोयला खदानों में लाखों टन कोयला पड़ा हुआ है। महाप्रबंधक बने प्रदीप कुमार को उच्चाधिकारियों द्वारा निर्देशित किया गया था कि बंद पड़े कोयला खदानों से शेष कोयला का उत्पादन कराया जाए, लेकिन इनकी निष्क्रियता के कारण वर्तमान में कई कोयला खदान बंद होने के कगार पर हैं।

बंद होते कोयला खदानों ने बढ़ाई मजदूरों की चिंता
भटगांव क्षेत्र की कई भूमिगत खदान पर्यावरणीय स्वीकृति एवं सीटीओ के अभाव में बंद होने के कगार पर हैं। ऐसे में सैकड़ों मजदूर विस्थापन की संभावना से भयभीत हैं। पूर्व में यूनियन के नेताओं ने कंपनी के सीएमडी से मांग की थी कि भटगांव क्षेत्र की कोई भी खदान बंद ना हो और क्षेत्र की प्रस्तावित महामाया ओपन कास्ट परियोजना तथा मदननगर ओपन कास्ट परियोजना को जल्द से जल्द प्रारंभ करने की दिशा में उचित पहल की जाए। खदानों में कार्य करने वाले मजदूर को अन्य स्थानों में विस्थापन की मार झेलनी ना पड़े।

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