छत्तीसगढ़ व सरगुजांचल में आदिवासी जनप्रतिनिधियों के हालात को लेकर लगा…?

रोमी सिद्दीकी,

छत्तीसगढ़ के सबसे बुद्धिमान, दृढ़ संकल्पित और आदिवासियों सहित समाज के हर तबके के लिए बेहर तरीके से विचार रखने वाले आदिवासी नेता डॉ. नंदकुमार साय ने अंतत: भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से लेकर सभी पदों से इस्तीफा दे दिया, उनके इस्तीफा से पूरे छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल सा आ गया है। हर कोई यह आंकलन करने में लगा है कि आखिर क्या कारण है भाजपा के दिग्गज आदिवासी नेता ने विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अपनी पार्टी से किनारा ले लिया।

हालांकि उनका एक वीडियो इंटरनेट मीडिया में वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि पार्टी के कुछ नेताओं के द्वारा उन्हें लंबे समय से उनके साथ भेदभाव करते हुए मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जा रहा था, जिसके कारण उन्होंने यह कदम उठाया है। ऐसे में एक प्रश्न खड़ा हो रहा है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेताओं की स्थिति बेहतर क्यों नहीं है? भाजपा व कांग्रेस दोनों ही दलों में आदिवासी नेतृत्व को या तो दबा दिया जाता है या फिर उन्हें किनारे लगा दिया जाता है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व बात करें तो छत्तीसगढ़ वर्ष 2000 में जैसे ही अस्तित्व में आया वैसे ही आदिवासी बाहुल्य प्रदेश का तमगा लग गया, जाहिर है आदिवासी बाहुल्य प्रदेश का मुखिया आदिवासी ही होगा। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने काफी जद्दोजहद करके छोटे से प्रदेश का कमान एक आदिवासी नेता या कहें पूर्व ब्यूरोक्रेट रहे डॉ.अजीत प्रमोद जोगी के हाथों में दे दिया। अजीत जोगी पर आदिवासी नेता ही बार-बार आरोप लगाते थे कि वे आदिवासी नहीं हैं। बहरहाल उनकी सोच, कार्यप्रणाली व दूरदृष्टि का आंकलन करें तो वे हमेशा ही आदिवासियों के हक की बात करते थे। वे चाहते थे बड़े पदों पर आदिवासी नेता ही बैठें और ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासी जनता को मुख्यधारा में जल्द से जल्द लाया जाए। मात्र तीन साल के मुख्यमंत्रित्व काल में उन पर यह आरोप लगना शुरू हो गया कि वे केवल आदिवासियों की बात करते हैं। यह आरोप एक हद तक सही भी था। तत्समय एक घटना मेरे परिवार के साथ भी हुई। मेरे वालिद जो उस समय शिक्षक के पद पर कार्यरत थे, अब सेवानिवृत्त हो गए हैं, उनके एक अच्छे मित्र चौबे चाचा हैं, दोनों ट्रांसफर के लिए रायपुर गए। अंबिकापुर से राजमाता देवेंद्र कुमारी के माध्यम से शिक्षा मंत्रालय फाइल चला गया लेकिन उस समय मुख्यमंत्री अजीत जोगी और सरगुजा राजपरिवार के बीच कितने मधुर संबंध रहे, यह सभी को पता है। यही कारण है अंबिकापुर से आने वाली फाइलों को मुख्यमंत्री कार्यालय में लाने का निर्देश जारी कर दिया गया। स्थानांतरण की प्रत्याशा में मेरे वालिद साहब व चौबे चाचा मुख्यमंत्री अजीत जोगी के सामने गए, लेकिन काम नहीं हुआ। वापस आने पर वालिद साहब ने मां को बताया कि जैसे ही वे मुख्यमंत्री के सामने उपस्थित हुए उन्होंने अपने सचिव से कहा कोई आदिवासी नहीं है क्या? मतलब साफ था जिला मुख्यालय के आसपास केवल आदिवासियों को लाया जाए। इसे बतलाने का मतलब यह था कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी आदिवासियों के लिए ज्यादा सोचते थे। बहरहाल विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ के बस्तर व सरगुजा के आदिवासी वोटरों ने उन्हें जो झटका दिया कि कांग्रेस 15 वर्षों के लिए वनवास में चला गया, फिर श्री जोगी दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन सके। इसके बाद भी पू्र्व मुख्यमंत्री श्री जोगी ने अपने जीवन काल में आदिवासी होने के प्रमाण देने के लिए जो संघर्ष किया वो एक मिसाल है। जैसे ही वे इस दुनिया को अलविदा किए उनके परिवार से आदिवासियों का तमगा भी हट गया।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद नंदकुमार साय ने भाजपा के लिए सड़क से लेकर सदन तक जो संघर्ष किया, वह किसी से छिपा नहीं है। एक नेता प्रतिपक्ष का घड़ी चौक रायपुर में पुलिस ने जिस बर्बरता से पीटते हुए पैर तोड़ दिया था, वह छत्तीसगढ़ के इतिहास में दर्ज है। भाजपा जब सत्ता में लौटी तो 15 वर्ष में नंदकुमार साय को क्या मिला, वे उनके ही श्रीमुख से सुना जा सकता है। भाजपा में उन आदिवासी नेताओं के नाम की सूची लंबी है, जिनसे किसी ना किसी भय के कारण सत्ता व संगठन ने धीरे-धीरे दूरी बना ली। इनमें कुछ की ही चर्चा होती है, जिनमें सबसे पहले नंदकुमार साय, विष्णु देव साय, गणेश राम भगत का नाम आता है। अविभाजित सरगुजा के शान तेज तर्रार पूर्व गृहमंत्री रामविचार नेताम, ननकीराम कंवर, स्व. शिव प्रताप सिंह, विजय नाथ सिंह, कमल भान सिंह सहित अन्य दिग्गज आदिवासी नेताओं की बात करें तो भाजपा संगठन में इनके नाम मात्र के होने और कुछ के लापता होने जैसी चर्चाएं होती हैं, यह कितना सत्य है, इसका आंकलन जनता खुद करे तो बेहतर है। कांग्रेस में आदिवासी नेताओं की स्थिति का आंकलन करें तो भाजपा से यहां स्थिति बेहतर है। महत्वपूर्ण इनकी स्वतंत्रता है, इसका जबाब देना जरा मुश्किल है। कांग्रेस भी मौजूदा समय में सत्ता व संगठन में संतुलन बनाने मात्र के लिए आदिवासी नेताओं को केवल आगे रखती है, जिसका प्रमाण प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष आदिवासी है, लेकिन मंत्रिमंडल या अहम मंत्रालय में किसी आदिवासी को नहीं दिया गया है। हाल में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश यादव सम्मेलन में एक बात कही थी कि कांग्रेस जातिगत जनगणना के पक्ष में है और यह भी कहा था जिसकी जितनी संख्या उसकी उतनी हिस्सेदारी। ऐसे में चुनाव के ठीक पहले नंदकुमार साय का भाजपा छोड़ कर कांग्रेस का दामन थामने पर राजनीति के पंडित अनुमान लगा रहे हैं कि उन्हें सत्ता में लौटने पर कुछ बड़ा दायित्व देने का वादा किया गया हो, तो बड़ी बात नहीं होगी। इतना तो तय है कि धर्मांतरण का मुद्दा उठाने वाले नंदकुमार साय के कांग्रेस में आने से इसका लाभ कांग्रेस को बेहिसाब मिल सकता है, वहीं खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। अंत में प्रश्न यह भी है…क्या संघ की विचारधारा को लेकर आगे बढऩे वाले नंद कुमार साय कांग्रेसियों के साथ कदम से कदम मिला पाएंगे…?

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