मनेंद्रगढ़ (शुद्धूलाल वर्मा) । संतान की दीर्घायु की कामना का पर्व हलषष्ठी शनिवार को श्रद्धाभाव से मनायी गई। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को हलषष्ठी को संतान की दीर्घायु के लिए महिलाएं व्रत रख कर विधि विधान से पूजा-अर्चना की। हलषष्ठी के दिन शनिवार को सुबह से ही स्नान कर महिलाएं व्रत रखकर पूजा की तैयारी में जुट गई थी। आंगन में सांकेतिक तालाब बनाकर उसमें झरबेरी, पलाश की टहनियों व कांस की डाल को बांधी फिर चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का व महुआ को बांस की टोकनी व मिटटी की चुकड़ी में भरकर दूध-दही, गंगा जल अर्पित करते हुए षष्ठी देवी की पूजा की ।बाजार से पूजन सामग्री सहित पसही के चावल, भुजेना, महुआ, मिट्टी की डबुली की खरीदी महिलाओ के द्वारा की गई थी। पुरोहितों के अनुसार हलछठ व्रत के पुत्रवती स्त्रियां ही व्रत रखती हैं। इस दिन गाय का दूध, दही भी नहीं खाया जाता। भैंस का दूध दही ही उपयोग में लाया जाता है। इस दिन स्त्रियां महुए की दातुन करतीं हैं।भाद्र माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी या हरछठ व्रत रखा जाता है। यह व्रत वही स्त्रियां करती हैं जिनको पुत्र होता है। जिनको केवल पुत्री होती है, वह यह व्रत नहीं करती। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु के लिए किया जाता है। इस व्रत में हल द्वारा जोता-बोया अन्न या कोई फल नहीं खाया जाता। क्योंकि इस तिथि को ही हलधर बलराम जी का जन्म हुआ था और बलराम जी का शस्त्र हल है।हलछठ व्रत में गाय का दूध, दही या घी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इस व्रत में केवल भैंस के दूध, दही का उपयोग किया जाता है। इस व्रत में महुआ के दातुन से दांत साफ किया जाता है।

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