शीर्षक पढ़कर आप ये मत सोचें कि हम नेता-मंत्री और सरकारी गाड़ियों पर लगी लाल बत्ती की बात कर रहे हैं। लाल बत्ती से हमारा मतलब है ट्रैफिक सिग्नल वाली लाल बत्ती, जिसका मतलब है रुकिए। लेकिन आज के दौर में लाल बत्ती की कदर करने वाले बहुत कम लोग हैं। आप सिग्नल पर खड़े हैं, और लाल बत्ती जल रही है, लेकिन आपके आगे पीछे खड़े कुछ उतावले बंदे इस बत्ती की कदर नहीं करते, क्योंकि उन्हें जल्दी रहती है। और इस जल्दी में वे हरी बत्ती जलने का इंतजार करना मुनासिब नहीं समझते हैं।

वहीं कुछ लोग आगे वालों को हॉर्न बजाकर सिग्नल जम्प करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। भाई आपको जल्दी है, लेकिन सामने वाला तो लाल बत्ती का सम्मान करते हुए खड़ा है। वहीं सिग्नल हरा हुआ नहीं कि उनकी उंगलियां हॉर्न पर मानो चिपक सी जाती हैं। भले ही सामने भीड़ हो, लेकिन उन्हें ऐसा लगता है कि हॉर्न बजाने से भीड़ हट जायेगी। इसके अलावा जिस व्यक्ति को दाएं जाना है, वह बाएं खड़ा रहता और जिसे बाएं जाना है वह दाएं। जैसे ही सिग्नल हरा होता है, धकापेल शुरू हो जाती है, और इस कशमकश में समय व्यतीत हो जाता है, और लाल बत्ती जल जाती है।

पिछले लेख में हमने राजधानी रायपुर में प्रचलित तीन फैशन का जिक्र किया था, उसमे से एक है सिग्नल जम्प करना, जो युवा से लेकर बुजुर्ग तक करते हैं। सिग्नल जम्प करना मतलब अपने साथ दूसरों की जान को जोखिम में डालना। पहले ट्रैफिक पुलिस के खौफ से लोग स्टॉप लाइन के पीछे ही अपनी गाड़ी लगाते थे, लेकिन ऑटोमेटेड सर्वेलन्स सिस्टम के लग जाने से ट्रैफिक पुलिस भी निश्चिन्त हो गई है। अगर कोई नियम तोड़ता है तो तीसरी निगाहों में उसकी करतूत कैद हो जाती है, और बाकायदा फोटो के साथ विभाग की और से घर पर चालान भी पहुंच जाता है। रायपुर ट्रैफिक विभाग सेंट्रल सर्वेलन्स सिस्टम की मदद से पूरी राजधानी की निगरानी करता है, वहीं चौक-चौराहों पर जवानों की तैनाती रहती है। एक तरह से देखा जाए तो यह सिस्टम बेहद कारगर है, लेकिन फिर भी सिग्नल जम्प करने वाले अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं।

 

अक्सर देखा गया है कि व्यस्त चौराहों में सिग्नल जम्प की घटना ज्यादा होती है। दोपहिया सवार जल्दबाजी में ये हरकत करते हैं। कई बार तो बुजुर्गों को भी सिग्नल जंप करते देखा गया है। लेकिन इन सब मामलों में युवा सबसे आगे हैं। तेज रफ़्तार बाइक ज्यादा देर तक खड़े रखना इन्हे पसंद नहीं है। भीड़ का सीना चीरते हुए ये जैसे तैसे आगे निकलते हैं, और न तो दायें देखेंगे और न ही बाएं, सीधे गाड़ी भगा देंगे। अब ऐसा करने में अगर कोई दूसरी तरफ से आने वाला इनसे टकरा जाए तो गलती सामने वाले की ही मानेंगे, और भिड़ जाएंगे। इसके अलावा एक स्टॉप लाइन नाम की लकीर होती है, जिसके पीछे आपको अपनी गाड़ी खड़ी करनी पड़ती है, लेकिन यह लाइन भी उपेक्षा का शिकार होती है। भाई इस लाइन के ठीक आगे जेब्रा क्रासिंग रहती है, जिसका उपयोग पैदल चलने वाले करते हैं, और अगर आप अपनी गाड़ी इस लाइन के आगे लगाएंगे तो उन्हें परेशानी होगी। लेकिन उन्हें किसकी फ़िक्र है। खैर, पैदल चलने वाले भी जानते हैं कि जेब्रा क्रासिंग पर खड़ी गाड़ियां हरी बत्ती होने का इंतजार करती हैं, इसलिए वे बीच सड़क पर चलते हैं।

 

ये तो हुई दोपहिया सवारों की बात, इनके अलावा तीन पहिया और चार पहिया वालों की भी यही हरकत है। ऑटो वाले तो यही मानते हैं कि उन्हें कहीं भी सवारी चढ़ाने-उतारने का अधिकार है। चौक पर डबल इंतजार होता है, एक सवारी का और दूसरा हरी बत्ती का। और अगर हरी बत्ती होने के बाद भी कोई सवारी हाथ दिखा दे, तो मजाल है कि वह ऑटो उसे बैठाए बगैर आगे बढ़े। भले ही पीछे वाले लाख गालियां दें, लेकिन ऑटो वाला अपने कर्त्तव्य का भली भांति निर्वाहन करता है, और दुबारा सिग्नल के हरे होने का इन्तजार करता है। वहीं चौक के ठीक आगे सवारी बैठाने-उतारने का सिलसिला चलता है, इसके चलते भी ट्रैफिक अवरुद्ध होता है।

 

वहीं शास्त्री चौक में तो मानो ऑटो वालों ने अपने अघोषित स्टैंड ही बना लिया है। शास्त्री चौक से मेकाहारा चौक तक आपको सड़क पर केवल ऑटो ही नजर आएंगे। अगर आपको बाएं मुड़ना है तो यह मोड़ सबसे मुश्किल है, क्योंकि ठीक मोड़ पर ऑटो वालों का जमावड़ा लगा रहता है। आधी क्या, पूरी सड़क घेरकर ऑटो वाले खड़े रहते हैं। सवारी भरी और बिना इंडिकेटर या हाथ दिखाए ये कट मारकर निकल जाते हैं। शास्त्री चौक हो या कोई और चौक, ऑटो वाले तो ऐसे यू टर्न लेते हैं मानो सड़क पर इनका ही अधिकार है। सिग्नल की परवाह किए बिना ये लंबा टर्न लेकर निकल जाते हैं।

 

चौक पर सिग्नल हमारी ही सुरक्षा और सहूलियत के लिए है, लेकिन हम ही इसका पालन करते हैं। अगर शहर में सुगम यातायात व्यवस्था बनानी है तो यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम यातायात नियमों का सही ढंग से पालन करें, और दूसरों को भी प्रेरित करें, ताकि यातायात व्यवस्था दुरुस्त रहे और दुर्घटना भी न घटे।

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