वन विभाग के नोडल बनने के अवैध आदेश पर दखल देने मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन
अंबिकापुर। सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति संघ, सरगुजा ने प्रदेश में वनाधिकार कानून के उचित व प्रभावी क्रियान्वयन की अवमानना कर, वन विभाग के नोडल बनने के आदेश पर तत्काल दखल देने की मांग करते हुए कलेक्टर सरगुजा को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा, जिसमें, सरगुजा जिले के उदयपुर, लखनपुर, लुंड्रा और बतौली विकासखंड अंतर्गत 47 गांव से काफी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही। इसमें उल्लेख किया गया है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश, वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन और सामुदायिक संसाधन अधिकार मान्य करने के मामले में देश में सर्वोच्च स्थान पर है, परंतु विगत वर्ष से इसकी प्रगति नगण्य है। कानून का उल्लंघन करने का प्रयास किया जा रहा है। हाल ही में वन विभाग द्वारा स्वयं को इस कानून की नोडल एजेंसी बनाने के कुत्सित प्रयास इसका उदाहरण है।
बता दें कि प्रदेश में तकरीबन 12 हजार आदिवासी बाहुल्य गांव प्रत्यक्ष रूप से जंगल पर अपनी आजीविका व सामाजिक-सांस्कृतिक की पहचान के लिए आश्रित हैं। मध्य-भारत में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से निपटने में प्रदेश का वन एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे में इनके संवर्धन, संरक्षण एवं प्रबंधन में वन-निर्भर समुदायों की भूमिका सुदृढ़ करना आवश्यक है। वनाधिकार मान्यता कानून के जरिए, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता और इसके बाद की सशक्तिकरण प्रक्रियाएं एवं सामाजिक संगठन, संस्थाओं से परामर्श की जरुरत है। वन विभाग द्वारा 15 मई 2025 को जारी, वन अधिकार का नोडल बनने संबंधित पत्र, वनाधिकार कानून का खुला उल्लंघन और आदिवासी विकास विभाग के विधिसम्मत अधिकार क्षेत्र पर सीधा अतिक्रमण है। पत्र के जरिए वन विभाग ग्राम सभाओं व उनकी प्रबंधन समितियों (सीएफएमसी) द्वारा तैयार प्रबंधन योजना को लागू करने पर रोक लगाने की कोशिश कर रहा है। यह प्रावधान वन आधिकार कानून की मूल भावना ‘समुदाय आधारित वन प्रशासनÓ को नष्ट करने का प्रयास है। विभाग का कहना कि आदिवासी मंत्रालय से प्रबंधन-आयोजना के लिए कोई प्रपत्र नहीं आने से, विभाग अपने वर्किंग प्लान आधारित प्रबंधन योजना को लागू करने की मिथ्यात्मक बातें कर रहा है, जबकि केंद्र की प्रधानमंत्री धरती आबा जनजाति ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत जारी दिशा-निर्देश में ग्राम सभाओं के लिए वन संसाधन प्रबंधन आयोजना का प्रपत्र सभी राज्यों को भेजा गया है।
संवैधानिक शक्तियों को कुचलने का लगा आरोप
वन विभाग ने सर्वोच्च न्यायालय के टी.एन. गोदावर्मन वाद का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि देशभर में केवल वर्किंग प्लान आधारित वैज्ञानिक प्रबंधन ही मान्य होगा। सवाल उठाया गया है कि यदि यही आधार है तो फिर संरक्षित क्षेत्र तथा वन विकास निगम पर अलग प्रबंधन ढांचे क्यों लागू हैं? स्पष्ट है कि विभाग चयनित मतभेद बनाकर ग्राम सभाओं की संवैधानिक शक्तियों को कुचलना चाहता है। उक्त आदेश में वन विभाग चेताता है कि उनके सिवाय कोई भी संस्था प्रबंधन कार्य न करे। वास्तविकता यह है कि वनों में ग्रामसभाएं और उनकी सीएफआर व्यवस्थाएं ही प्रबंधन करती है। शासकीय या अशासकीय संस्थाएं तकनीकी सहयोग मात्र देती हैं। यदि अन्य विभाग को ग्राम सभा के साथ कार्य करने से रोक जाएगा, तो विभागांतर्गत योजनाओं से कंवरजेंस निधि ग्रामसभा को कैसे प्राप्त होगी। वन विभाग इसी सहयोग को रोककर ग्राम सभाओं को पुन: निर्भर और निर्बल बनाना चाहता है, ताकि अवैध कूप कटाई, मोनो कल्चर प्लांटेशन आदि मनमानी गतिविधियां बेरोकटोक चल सके।
वनों के कॉर्पोरेट नियंत्रण में चले जाने का खतरा
सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति संघ का कहना है कि हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ में जबरन बेदखली और हजारों हेक्टेयर वन भूमि को कार्बन बाजार व खनन परियोजनाओं हेतु खोलने के प्रयास हुए हंै। ग्राम सभाओं को संसाधन-प्रबंधन में अकेले करने से, वनों के कॉर्पोरेट नियंत्रण में चले जाने का खतरा दिखाई दे रहा है। इधर, 23 जून 2025 के पत्र में विभाग ने स्पष्टीकरण दिया है कि वह ‘नोडलÓ एजेंसी नहीं है, बल्कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मान्यता के लिए ‘समन्वयनÓ का काम करेगा, लेकिन वन संसाधन प्रबंधन के ग्राम सभा के लिए अन्य विभाग व अशासकीय संस्थाओं पर प्रतिबंध यथावत रखा है। इस आदेश को तुरंत प्रभाव से समाप्त करने और प्रदेश के ऐसे समस्त वन-निर्भर गांव जिनको सामुदायिक वन अधिकार नहीं मिले हंै, उन्हें सक्षम बनाने की मांग की गई है। कहा गया है कि ग्राम सभाओं और सीएफएमसी द्वारा तैयार प्रबंधन एवं संरक्षण योजनाओं को बिना देरी मान्यता दी जाए तथा आवश्यक तकनीकी वित्तीय समर्थन उपलब्ध कराया जाए। इसके अलावा, सामुदिक वानिकी के समस्त कार्य ग्रामसभा में गठित समुदायिक वनसंसाधन समिति द्वारा कराए जाएं। जिले में गठित कन्वर्जेन्स समिति में, प्रबंधन में ग्रामसभा को सहयोग करने वाली अशासकीय संस्थाओं को सदस्य के रूप मे शामिल किया जाए। यह समिति, अन्य योजनाओं से निधि का प्रबंधन-कार्यों के लिए अभिसरण हेतु अनुशंसा करेगी। जब तक संबंधित योजनाओं की निधि कन्वर्जेन्स द्वारा ग्रामसभा में नहीं आती, तब तक मनरेगा के जरिए कम से कम 100 दिन का काम जंगल प्रबंधन के लिए ग्राम सभा को सौंपा जाए।
उच्च न्यायालय के मंशानुरूप दिया जाए अधिकार
संघ ने चिंता व्यक्त करते हुए ज्ञापन में उल्लेख किया है कि पिछले कुछ माह से प्रदेश में वन भूमि से कब्जा छुड़ाने के नाम पर बलपूर्वक बेदखली, वनकर्मियों द्वारा प्रताड़ित करने की खबरें सामने आई हंै। वनाधिकार कानून में दिए गए कट-ऑफ 13 दिसम्बर 2005 के पश्चात वनभूमि पर कब्जा निंदनीय है, इसके लिए उचित कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। वर्तमान में वन विभाग की एकतरफा कारवाई, बगैर नोटिस दिए व बगैर इस पहलू पर विचार किए कि वनाधिकार के दावों का निस्तारण हुआ है अथवा नहीं, मनमाना कार्रवाई की जा रही है। प्रदेश में अभी भी वनाधिकार के लाखों दावे पूर्णत: विचारण किए बिना लंबित हैं, जिनमें ग्राम सभा का अनुमोदन और साक्ष्य का अभाव है। मांग की गई है कि प्रदेश में लंबित व्यक्तिगत वनाधिकार के दावों का समयबद्ध व पारदर्शी तरीके से निपटारा किया जाना चाहिए, जिसमें ग्राम सभा की अनुशंसा व साक्ष्यों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार हो। अब भी अति पिछड़े आदिवासी, एकल महिला के लिए वन-अधिकार देने की प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की जरुरत है। उन अधिकार-पत्रकों, जिनमें वाजिब दावे से कम भूमि दी गई है, पर अधिकार-पत्रक सुधार की कार्रवाई शुरू की जाए। उच्च न्यायालय के मंशानुरूप प्रदेश के सभी अति पिछड़े आदिवासी और कृषि-पूर्व समुदायों को जल्द पर्यावास का अधिकार दिया जाए।

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