स्मार्ट फोन की लत युवाओं को पहुंचा रही बरबादी के कगार पर

अंबिकापुर। पिता ने मोबाइल रिचार्ज करने से मना कर दिया तो 16 वर्षीय किशोर जहर सेवन कर लिया। किशोर को क्षेत्रीय अस्पताल से रेफर करने पर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना ने बेलगाम सोशल मीडिया और वर्तमान में हो रहे मोबाइल के असीमित उपयोग को लेकर अभिभावकों को चिंतित कर दिया है।
जानकारी के अनुसार सूरजपुर जिले के भैयाथान थाना क्षेत्र का 16 वर्षीय किशोर लम्बे समय से मोबाइल का आदी हो चुका है। स्मार्ट फोन में डूबे रहने के कारण उसकी पढ़ाई भी प्रभावित हुई और वह कक्षा दसवीं में फेल हो गया। उसे फेल होने का रंज तो नहीं रहा। तीन दिन पहले उसने अपने पिता से मोबाइल रिचार्ज कराने के लिए रुपये मांगे, जिस पर पिता ने पैसे नहीं होने की बात कहकर टाल दिया। इतनी सी बात किशोर को नागवार गुजरी और उसने जहरीला पदार्थ का सेवन कर जान देने की कोशिश की। स्वजनों को इसका पता चला और आनन-फानन में उसे उपचार के लिए सूरजपुर जिला अस्पताल पहुंचाए। यहां से रेफर करने पर मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर लाकर भर्ती कराया है, जहां उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। बता दें शुरू-शुरू में जब मोबाइल आया था तो उस समय की पेड वाला फोन होता था, जिसमें ज्यादातर बातें ही होती थी। इसमें जो गेम होते थे वह 10 मिनट खेलकर ही बच्चे ऊब जाते थे। जैसे-जैसे फोन स्मार्ट होता गया बच्चों का बौद्धिक स्तर गिर रहा है। नशे की तरह मोबाइल की लत इन्हें लगती जा रही है। शेष कसर सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले रील्स ने पूरी कर दी है, जिसमें दिन-दिन भर लोग चिपके रहते हैं। रील्स का यह खुमार युवाओं में सिर चढ़कर बोल रहा है। कई लोग रील्स बनाते हुए अपनी जान तक गवां चुके हैं, परन्तु इससे लोगों को फर्क नहीं पड़ रहा है।

स्मार्टफोन की गांव-गांव तक पहुंच
वर्तमान में स्मार्टफोन की पहुंच गांव-गांव तक हो चुकी है। अनलिमिटेड मोबाइल डाटा का प्लान रिचार्ज कराने से रोजाना इतना डाटा मिल जाता है कि आधे से ज्यादा दिन ही नहीं देर रात तक बच्चे और युवा मोबाइल से चिपके नजर आते हैं। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे कई सोशल मीडिया एप्प और इनमें आने वाली रील्स तथा चैनल ने युवाओं को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिससे युवा मोबाइल से पूरी तरह से बंध चुके हैं। मोबाइल का यही लत अब जान पर भारी पड़ रहा है, वहीं अभिभावक भी परेशान हैं।  

मोबाइल की ओर रुझान इसलिए भी
कोविडकाल के दौरान बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई, इसके बाद मजबूरी में एक घर में दो से तीन, चार मोबाइल फोन हो गए। पढ़ाई के बहाने इनका ध्यान गेम व रील्स पर गया और यह इनके दिलोदिमाग में रच-बस गया। कोविड का दौर भले ही खत्म हो गया अभी भी कई बच्चे गूगल में पढ़ाई से संबंधित चीजों के सर्च के बहाने सोशल मीडिया में आने वाले वीडियो, रील्स तक पहुंच जाते हैं, जिससे इनके शिक्षा का स्तर तो गिर ही रहा है, इसका असर सेहत और आंख पर भी पड़ रहा है। कई बच्चे ऐसे हैं जो मोबाइल देखने को नहीं मिले तो स्वजन से उलझ जाते हैं। स्मार्ट फोन बच्चों को चिड़चिड़ा भी बना रहा है। अभिभावकों को छोटे बच्चों के रोने पर उन्हें चुप कराने के लिए हाथों में मोबाइल थमाने की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

मोबाइल के कारण बच्चों में एकाग्रता समाप्त हो रही है। वर्तमान में बच्चे इंस्टाग्राम व रील्स को देखते हैं, जो उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है, इससे बच्चे खेलकूद व पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाते हैं। पालकों को ध्यान देना होगा कि पढ़ाई के उपयोग के लिए बच्चे मोबाइल लें। अर्नगल उपयोग पर सख्ती बरतना होगा, अन्यथा मोबाइल की लत बच्चों को मनोविकार का शिकार बना सकती है।

डॉ. संदीप टी, मनोरोग विशेषज्ञ
मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर

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