नियमानुसार भर्ती मरीजों का प्राथमिकता देते हुए किया जाना है जांच

अस्पताल के लचर सूचनातंत्र से बदहाल व्यवस्था की तस्वीर सामने आ रही    

अंबिकापुर। शहर के शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध जिला अस्पताल में सोनोग्राफी जांच के लिए रोजाना लंबी लाइन लगती है। आए दिन पीड़ितों को मशक्कत करनी पड़ती है। भीड़ के बीच गंभीर मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। जांच हो गया तो ठीक, नहीं तो नंबर लगाने के बाद अगले दिन मरीज को लेकर आना पड़ता है। ऐसे में भर्ती मरीजों का पहले सोनोग्राफी जांच कराने का प्रावधान बनाया गया है। कई बार भीड़ के बीच भर्ती मरीजों को भीड़ का हिस्सा बना देने से वे स्ट्रेचर, व्हील चेयर या जमीन पर लेटकर कराहते रहते हैं। अस्पताल में असुविधाओं की निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे जगह-जगह लगाए गए हैं, लेकिन जिम्मेदारों की निगाह ऐसे पीड़ितों तक नहीं पहुंच पाती है। कई बार तो जांच के लिए अगले दिन पहुंचने जैसे हालात बन जाते हैं। मंगलवार, 19 मार्च को कराहती बच्ची के जांच के लिए साढ़े तीन घंटे इंतजार की स्थिति का नजारा अस्पताल में देखने को मिला। हालांकि इसके पीछे दोष जांच करने में लगे चिकित्सक का नहीं बल्कि सूचनातंत्र की कमी का था। सोनोग्राफी जांच में लगे चिकित्सक को पता ही नहीं था कि बाहर भर्ती बच्ची को 20 नंवबर थमा दिया गया है और वह इंतजार के बीच पीड़ा झेल रही है। बता दें अस्पताल का रेडियोलॉजी विभाग वर्तमान में दो चिकित्सकों के भरोसे चल रहा था। अगर एक चिकित्सक को किसी काम से कहीं जाना पड़े तो मुख्य अस्पताल भवन के एक्स-रे सोनोग्राफी कक्ष व एमसीएच के सोनोग्राफी कक्ष में ईएनसी जांच का एक चिकित्सक पर भार आ जाता था। एक चिकित्सक की बांड पर नियुक्ति जरूर हुई है, लेकिन वे अपने कर्तव्य के प्रति गंभीर नहीं रहीं, जिस कारण वे सुर्खियों में हैं। सोनोग्राफी में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए एक चिकित्सक की हाल में पदस्थापना की गई है, जिससे व्यवस्था में तब्दीली आने की संभावना है।    

यह था मामला
जशपुर जिला के सन्ना थाना अंतर्गत ग्राम रौनी निवासी अमृत राजवाड़े अपनी 12 वर्षीय पुत्री अंजिला राजवाड़े को पेट दर्द की शिकायत पर मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर लाकर भर्ती कराया है। बच्ची का मंगलवार को सोनोग्राफी जांच होना था। इसके लिए स्वजन भूखी-प्यासी बच्ची को वार्ड से लाकर सुबह नौ बजे से ही बैठे थे। बच्ची दर्द से कराह रही थी। सोनोग्राफी के लिए उसे 20वां नंबर मिला था, जबकि प्रावधान के अनुरूप भर्ती मरीजों का पहले सोनोग्राफी किया जाना है। इसके बाद भी लगभग साढ़े तीन घंटे इंतजार के बाद उसका सोनोग्राफी हो पाया। ऐसे हालातों के बीच भर्ती मरीजों के बीच कभी भी गंभीर परिस्थिति बन सकती है।

इसलिए बन रहे ऐसे हालात
शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध जिला अस्पताल में आज की स्थिति में 4 रेडियोलॉजिस्ट हैं, इनमें से एक डॉ. अनुपमा की पदस्थापना हाल में जांच में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए की गई है। दो साल के बांड पर नियुक्त रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आकांक्षा को लेकर शिकायतों की भरमार है। न तो वे सिटी स्कैन में बेहतर सेवा दे पाई, न ही सोनोग्राफी जांच की जिम्मेदारी के प्रति गंभीर रहीं, जिससे शिकायतों की लंबी फेहरिश्त है। इस अस्पताल में एक समय रेडियोलॉजी विभाग का दारोमदार एकमात्र डॉ. सरिता सिंह पर था। इन्हें विभाग के लिए नजीर कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि वे अपने काम को तत्समय भी ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करते रहीं और आज भी कर रही हैं, जबकि उन्हें कई बार जांच छोड़कर पेशी के लिए न्यायालय का दौड़ लगाते देखा गया है, जिससे व्यवधान की स्थिति भी बनती थी।  

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