गिरिजा कुमार ठाकुर

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 के लिए हुए मतदान के बाद मतदाता खामोश हैं। वहीं चुनाव में हिस्सा लिए मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी मतदाताओं के बीच मशक्कत के बाद मतगणना तिथि तीन दिसंबर के इंतजार में हैं। अंदर ही अंदर भितरघात की चिंता भी कुछ प्रत्याशियों को सता रही है। कुछ तो मतदान का परिणाम सामने आने के पहले ही अपनी जीत सुनिश्चित कर चुके हैं। बात प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टियों की करें तो इनसे नाता रखने वालों कुछ निठल्ले कार्यकर्ताओं की जुबां न सिर्फ सरकार बल्कि विधानसभा की कुर्सियां किसके पाले जाएगी, यह भी बैठे-ठाले तय कर ले रही है। कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए जुगलबंदी करते जोश-जोश में बाजी, शर्त, सट्टा लगाने में बाज नहीं आ रहा है तो कोई गृहमंत्री की कुर्सी को तवज्जो दे रहा है। इधर पांच साल विपक्ष में रहने के बाद पूरे जोश-खरोस के साथ मैदान में उतरी भाजपा पूरे प्रदेश की अधिकतर सीट में जीत को लेकर आशावान हैं, इससे जनता के बीच से सवाल कांग्रेस के पंचवर्षीय कार्यकाल को लेकर उठ रहा है। मोदी की गारंटी और कांग्रेस के द्वारा जनता को दिए गए विकल्प मतदाता को कितना प्रभावित किए इसे लेकर तर्क-कुतर्क होना बंद नहीं हुए हैं। मतदाताओं के बीच ऐसा भी वर्ग है, जिनके बीच मतदान की तिथि तक कोई दस्तक देने नहीं पहुंचा। इसके बाद भी उन्होंने अपनी इच्छा से लोकतंत्र के महापर्व में मतदान की आहूति दी है। वे नोट-वोट, प्रलोभन की सामने आ रही राजनीति को लेकर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव के दौरान जब्त किए गए करोड़ों रुपये नगद व लाखों, करोड़ों की प्रलोभन सामग्री किसके लिए। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या मतदाताओं का ‘मतदानÓ नेताओं के ‘नजरे इनायतÓ का पक्षधर बनकर रह गया है। ऐसे हालात आने वाले चुनाव को और भी संघर्षपूर्ण बनाने को इंगित करा रहे हैं। इसे लेकर समाज का एक वर्ग कह रहा है कि इन परिस्थितियों के बीच जनता को कैसे मिल पाएंगे ईमानदार नेता।

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