कोई 90 करोड़ तो कोई 46 करोड़ देने बजा रहा गाल

केंद्रीय राज्यमंत्री ने अंबिकापुर विधायक व स्वास्थ्य मंत्री तक को झिंझोड़ डाला

गिरिजा कुमार ठाकुर

अंबिकापुर। सरगुजा जिले के दरिमा में स्थित मां महामाया एयरपोर्ट की सौगात दिलाने के लिए जनप्रतिनिधियों ने कितना ईमानदारी पूर्वक प्रयास किया यह किसी से छिपा नहीं है। अंबिकापुर विधायक टीएस सिंह देव की बात करें तो उन्होंने केंद्रीय उड्डयन मंत्री से निरंतर पत्र व्यवहार जारी रखा और सरगुजा संभाग के लोगों को बेहतर हवाई सुविधा का लाभ मिले, इसके लिए निरंतर प्रयास भी किया। उन्होंने किस रूट में हवाई सेवा की जरूरत है, इससे भी इंगित कराया है। प्रदेश के खाद्य मंत्री अमरजीत भगत भी एयरपोर्ट के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा रुपये देने की बात करने में पीछे नहीं हैं, वे यह भी कहते हैं, राजनीतिक चश्मे से किसी कार्यक्रम को नहीं देखना चाहिए। इन सबके बीच हम यह नहीं कहते कि विपक्षी पार्टी भाजपा की ओर से एयरपोर्ट के लिए किसी प्रकार का प्रयास नहीं किया गया, लेकिन एयरपोर्ट की सौगात संभाग वासियों को मिलने के बाद जिस प्रकार बयानबाजी की बौछार लगी है, उसे देखते हुए यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि भाजपा हो या कांग्रेस इन्होंने एयरपोर्ट के लिए रुपये कहां से लाए। वास्तव में एयरपोर्ट की सौगात की असली हकदार जनता है, जिसने अपने मेहनत की गाढ़ी कमाई का अंशदान प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में सरकार को किया है। इसके लिए पृथक से टकसाल से रुपये छपकर नहीं मिले। इसके बाद भी जनता को दरकिनार कर श्रेय लेने की होड़ में लगे नेता जनता को भूल गए, जिनके बदौलत उनकी पहचान मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, केंद्रीय मंत्री, विधायक के रूप में है। चौतरफा सरकारी फरमान के बोझ तले दबे रहने वाली जनता ही वास्तव में इस सौगात की जननी है, जो इन्हें वोट देकर शीर्ष तक पहुंचाने के बाद इनके भर्राशाही, तानाशाही, भ्रष्टाचार के बाहुपाश में जकड़े रह जाती है। सरकारें भूल जाती है कि उनकी पोजीशन बनाने वाले जिस दिन ब्रह्मास्त्र के रूप में ईवीएम में दिए नोटा का प्रयोग करने उतारू हो गए, उस दिन वे कहीं के नहीं रहेंगे। चुनावों में नोटा का प्रयोग कहीं ना कहीं जनता को मतदान रूपी अस्त्र का प्रयोग करने प्रेरित ही किया है। प्रत्याशियों के चुनाव चिन्ह के साथ नोटा का होना यह संकेत देता है कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर करें। ऐसे में जनता की अहमियत को सिर्फ चुनाव के समय समझने की कोशिश राजनेताओं के द्वारा करना, कभी ना कभी बड़ी भूल साबित हो सकती है, विशेषकर उन जनप्रतिनिधियों के लिए जो सत्ता हथियाने के बाद जनमानस को चरणरज समझने की भूल कर बैठते हैं।

*चुनाव के समय आती है तारणहार जनता की याद*

चुनाव के समय मतदाताओं को रिझाने तरह-तरह के हथकंडे अपनाने की कोशिश होती है। कमजोरी जनता की भी है, जो यह नहीं समझती कि उन्हीं का लिया-दिया अंश उन्हें लुभाने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। कहने का तात्पर्य है कि जनता की भावनाओं का कद्र नहीं करना किसी भी पार्टी के प्रतिनिधि को भारी पड़ सकता है। नेताओं की बयानबाजी के तेवर तीखे हों या लुभावने, यह चिल्ल-पों उनके बीच रहकर जिंदाबाद के नारे लगाने वाले लोगों और इनकी तालियों की गड़गड़ाहट के बीच गुम होकर ना रह जाएं, जिनमें जनता के हित की सोंच तनिक मात्र नहीं रहती। किसी ने इनकी करतूतों को सुर्खियों में ला दिया, तो उसे ये अपने जानी-दुश्मन से कम नहीं समझते। ऐसा परिदृश्य छत्तीसगढ़ की राजनीति के बाद सामने आ चुका है और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को धरने पर बैठना पड़ा है। ऐसे प्रतिभा के धनी मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक जैसे नामचीन जनप्रतिनिधियों की पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव के आगे उनकी तूती बोलवाने वाले मात्र हैं, जिनकी डींग के आगे सिर्फ हंसी के फुहारे छूट सकते हैं,धरातल पर जरूरतमन्दों की कमी ना तो ये दूर करवा सकते हैं और ना ही खुद पूरी कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी समय रहते खुद में बदलाव लाने व जनता की अहमियत को समझने की है। वरना…जनता तो जनता है…जो साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए, मैं भी भूखा ना रहूं…साधु ना भूखा जाए…को चरितार्थ करने वाली है।

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