दो पशु चिकित्सक व अन्य कर्मचारी करते हैं नियमित देखभाल, देते हैं लेक्टोजेन दूध पावडर का खुराक

गिरिजा ठाकुर

अंबिकापुर। एक वर्ष बाद भी नन्हा हाथी अपने दल में नहीं मिल पाया है। यह पिछले वर्ष जशपुर जिले के तपकरा वन क्षेत्र से अपने दल से बिछड़ चुका था। इसके बाद उसे रमकोला रेस्क्यू सेंटर में रखा गया और उसका उपचार किया जा रहा है। इंसान के बच्चों की तरह बिन मां का बच्चा मानकर उसका लालन-पालन किया जा रहा है। वह आज भी घास व चारा नहीं खाता है। उसे लेक्टोजेन दूध पाउडर व मिल्क फार्मूला बनाकर आहार में दिया जाता है। इसके पीछे दो पशु चिकित्सक व अन्य कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। चिकित्सकों व वन विभाग के प्रयास के बाद अब हाथी का बच्चा रेस्क्यू सेंटर में चहलकदमी करना शुरू कर दिया है। उसका नामकरण भी कर दिया गया है। इसे अब जगदम्बा नाम से पुकारा जाता है।

जशपुर जिले के तपकरा वन परिक्षेत्र से अपने दल से बिछड़कर एक नन्हा मादा हाथी गांव में आ गया था। इसकी सूचना मिलने पर जशपुर वन विभाग की टीम ने हाथी के बच्चे को अपने कब्जे में ले लिया। इसे लगभग एक माह तक अपने कब्जे में रखने के साथ उसके दल से मिलाने की कोशिश की गई पर सफलता नहीं मिली। एक माह तक अपने परिवार से नहीं मिलने और जंगल का माहौल नहीं मिलने के कारण वह बेहद कमजोर व बीमार हो गया था। इसके बाद उसे रमकोला रेस्क्यू सेंटर लाया गया। हाथी का नन्हा बच्चा एक वर्ष से अधिक हो गए यहां रह रहा है। इसकी निगरानी दो पशु चिकित्सक व वन विभाग की टीम कर रही है। इलाज कर रहे चिकित्सक डॉ. अजीत ने बताया कि नन्हें हाथी की स्थिति पहले से बेहतर है। पिछले एक वर्ष तक उसे मेडिसिन व मिल्क फार्मूला देकर जीवित रखा गया, क्योंकि उसने नेचुरल आहार लेना छोड़ दिया था, इसलिए वह काफी कमजोर हो गया था।
इंसान के बच्चों की तरह पाल रहे

डॉ. अजीत ने बताया कि हाथी के बच्चे की इंसान के बच्चों की तरह ही देखभाल की जा रही है। कमजोर बच्चों को जैसे मल्टी विटामिन व अन्य आवश्यक आहार दिए जाते हैं ठीक उसी तरह दल से बिछड़े नन्हे हाथी के बच्चे को लेक्टोजेन पावडर दिया जा रहा है। काफी कमजोर हो जाने के कारण वह भोजन नहीं कर पा रहा था। इसलिए उसे प्रतिदिन लेक्टोजन दूध पाउडर का आहार बनाकर दिया जाता है। चिकित्सक ने बताया कि काफी संघर्ष के बाद उसकी स्थिति में अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

धीरे-धीरे हो रहा ग्रोथ
वाइल्ड लाइफ के डिप्टी डायरेक्टर के. श्रीनिवासन ने बताया कि हाथी के बच्चे के उपचार के लिए दो पशु चिकित्सक व महावतों की ड्यूटी लगाई गई है। प्रतिदिन वे उसके उपचार के साथ ही तरल आहार देते हंै। जिस समय रमकोला रेस्क्यू सेंटर में यह शावक आया था उसका वजन मात्र 90 किलो का था। अब वजन लगभग 450 किलो हो गया है। धीरे-धीरे वह ग्रोथ कर रहा है और रेस्क्यू सेंटर में चहलकदमी करता है।

जंगल में छोड़ना से पड़ सकता है खतरे में
वाइल्ड लाइफ के डिप्टी डायरेक्टर के. श्रीनिवासन ने बताया कि अभी लगभग तीन वर्षों तक उसे यहीं रखा जाएगा और उसकी पूरी देख-रेख की जाएगी। अभी जंगल में छोड़ना उसके लिए खतरे से कम नहीं रहेगा। वह जंगल में अभी खुद को सर्वाइव नहीं कर पाएगा। इन सबके बावजूद अगर कोई दिशा-निर्देश मिलते हैं तो उस दिशा में काम किया जाएगा।

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