सड़क हादसे में डॉटा एंट्री ऑपरेटर हुआ लकवाग्रस्त, 7 वर्ष से नहीं मिला पगार

तहसील कार्यालय धौरपुर का चक्कर काटने के बाद पहुंचा कलेक्टोरेट

अंबिकापुर। सरगुजा जिले के धौरपुर तहसील में डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर पदस्थ युवक करीब सात वर्ष पूर्व बाइक से अनियंत्रित होकर गिर गया था, जिसमें उसे चोटें आई थी। रायपुर में चले इलाज दौरान जमा पूंजी खत्म हो गई, जमीन और जेवर तक बिक गया। कर्ज लेकर लाखों रुपये फूंकने के बाद उसके शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। इस बीच उसे वेतन के नाम पर एक रुपये नहीं मिला, और न ही इलाज के लिए किसी प्रकार की सहायता मिल पाई। ऐसे में वह अपनी पत्नी, बच्चे और बूढ़ी मां के साथ बदहाली भरा जीवन जी रहा है। मंगलवार को वह कलेक्टोरेट अंबिकापुर में कलेक्टर के जनदर्शन में तिपहिया सायकल से पहुंचकर अपनी व्यथा से अवगत कराया।

बता दें कि बुधेश्वर प्रसाद सिदार पिता बिसाहू राम सिदार 35 वर्ष मूलत: छत्तीसगढ़ के सक्ती जिला अंतर्गत ग्राम डबरा का रहने वाला है। वर्ष 2014 में वह व्यापम की परीक्षा में शामिल हुआ था। इसके बाद उसे रेग्युलर डॉटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर धौरपुर तहसील में नियुक्ति मिली थी। नौकरी ज्वाइन करने के बाद मां, पत्नी और बच्चे की परवरिश का ध्यान रखते हुए वह अपने पदस्थापना स्थल में नियमित सेवा दे रहा था। वर्ष 2019 में निजी काम से अपने गृहग्राम डबरा गया था, इस दौरान डबरा तहसील के पास ही मोटरसायकल से अनियंत्रित होकर वह गिर गया, जिसमें उसे चोटें आई थी। क्षेत्रीय अस्पताल में इलाज के बाद स्वजन उसका उपचार रामकृष्ण केयर अस्पताल रायपुर में करा रहे थे। यहां लगभग तीन माह तक चले इलाज के दौरान हालात ऐसे बने कि, घर की जमा पूंजी खत्म हो गई। रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाना पड़ा, लेकिन कोई कितनी मदद करता। पुश्तैनी जमीन और जेवरात तक एक-एक करके बिक गये।

कभी कंप्यूटर के की बोर्ड पर दौड़ती थी उंगलियां

25 लाख रुपये से अधिक खर्च करने के बाद अभी स्थिति यह है कि जिन हाथों की उंगलियां कम्प्यूटर में दौड़ती थीं, आज उसके हाथ में इतनी ताकत शेष नहीं है कि वह अपना नाम भी कलम से आसानी से लिख सके। बुधेश्वर के शरीर का एक हिस्सा तो पूरी तरह से अशक्त हो गया है। करीब तीन लाख रुपये कर्ज का बोझ कैसे अदा होगा, इसकी चिंता बूढ़ी मां कीरतन बाई सिदार को सता रही है। ऐसे हालातों के बीच वह कई बार धौरपुर तहसील का चक्कर तिपहिया सायकल में अपने पुत्र को लेकर काट चुकी है, ताकि पुत्र के वेतन की राशि मिल सके, और कर्जमुक्त होने के साथ ही बहू और पोते के जीने की राह आसान हो सके।

हादसे के बाद वर्ष 2019 से नहीं मिला वेतन

बुधेश्वर बताता है कि नौकरी लगने के बाद उसे तहसील कार्यालय से नियमित वेतन भुगतान हो रहा था, लेकिन 2019 में हुये हादसे के बाद उसकी पूछ-परख विभाग के जिम्मेदारों ने नहीं ली। वर्तमान में उसके हालात ऐसे नहीं हैं कि वह अपने कार्यस्थल में नियमित सेवा दे सके। घर का इकलौता कमाऊ सदस्य होने के कारण उसका पूरा परिवार संकट के दौर से गुजर रहा है। वेतन नहीं मिलने से मां, पत्नी और 8 वर्षीय बच्चे का पालन-पोषण कैसे होगा, इसकी चिंता से वह हमेशा घिरे रहता है। ऐसे हालातों के बीच वह पहली बार कलेक्टर सरगुजा के जनदर्शन में पहुंचा, ताकि उसकी समस्या का निराकरण हो सके।

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