पीड़िता के साथ बिना इलाज किए भगाया, न्यायालय ने सुसंगत धाराओं के तहत अभियोग पंजीबद्ध करने आदेशित किया
अंबिकापुर। शहर के एक निजी अस्पताल में बीमार पुत्री को इलाज के लिए लेकर जाने पर प्रबंधक/संचालक के द्वारा दुर्व्यवहार और इलाज नहीं करने का आरोप अधिवक्ता ने लगाया है। उन्होंने इसकी शिकायत कलेक्टर, पुलिस सहित तमाम आला अधिकारियों से की, लेकिन उनके आवेदन को किसी ने संज्ञान में नहीं लिया। इससे खफा अधिवक्ता ने न्यायालय में परिवार दायर किया था, जिस पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने थाना प्रभारी गांधीनगर को आदेशित किया है कि उक्त घटना की जांच करके सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीबद्ध कर नियमानुसार विवेचना किया जाना सुनिश्चित करें। प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति दो सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने व प्रकरण का परिणाम दर्ज कर नियत अवधि में अभिलेख, अभिलेखागार को प्रेषित करने का निर्देश दिया गया है।
मेयर कॉलोनी साईं मंदिर रोड निवासी विधि व्यवसायी नीरज वर्मा ने अपने अधिवक्ता अशोक चौधरी के माध्यम से न्यायालय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंबिकापुर को अवगत कराया था कि वे अपनी पुत्री को गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के कारण डॉ. टेकाम के क्लिनिक नवापारा, अंबिकापुर में 05/09/2023 को ले जाकर जांच कराए थे। डॉ. टेकाम के निर्देश पर उन्होंने अपनी पुत्री का ब्लड जांच कराया। ब्लड जांच के बाद रक्त अल्पता के साथ डेंगू का लक्षण होना रिपोर्ट में सामने आया। पुत्री के स्वास्थ्य निरंतर गिरावट को देखते हुए वे उसको अपने घर के नजदीक श्री महावीर अस्पताल में 07/09/2023 को ले गए और अस्पताल में ओ.पी.डी. शुल्क 300 रुपये जमा कराया। इसके बाद उनकी पुत्री को केज्युल्टी रूम में ले जाया गया। यहां डयूटीरत डॉक्टर के द्वारा जांच करने के बाद मेडिसीन हेतु पर्ची दी गई और संस्थान के मेडिकल स्टोर से दवा लाने के लिए कहा गया, साथ ही रिसेप्शनिष्ट काउंटर में भर्ती हेतु 3000 रुपये तथा पैथॉलॉजिकल परीक्षण हेतु ब्लड सैंपल लेकर शुल्क जमा कराया गया। केज्युल्टी में डयूटीरत डॉक्टर ने जांच बाद बताया कि मरीज को टायफायड एवं डेंगू है, जिस कारण प्लेटलेट्स एवं रक्त बिल्कुल निम्नतम स्तर पर आ गया है, तत्काल दो युनिट प्लेटलेट्स एवं दो युनिट ब्लड दिया जाना आवश्यक है। केज्युल्टी कक्ष में ही उनकी पुत्री को इंजेक्शन एवं स्लाइन चढ़ाया गया। केज्युल्टी रूम में दो बेड थे, जो फुल हो चुके थे अन्य मरीजों का आना-जाना लगा था, इस कारण ड्यूटीरत डॉक्टर ने कहा गया कि जनरल वार्ड का बेड नंबर 12 खाली होने वाला है, उसमें मरीज को शिफ्ट किया जाएगा। उन्होंने आग्रह किया यदि व्यवस्था नहीं है तो उनके मरीज के लिए जमीन पर बिस्तर लगवा दीजिए ताकि मरीज की पीड़ा का निराकरण हो सके। आरोप है कि उक्त बात चिकित्सक को नागवार गुजरी और वह आक्रोशित एवं आवेश में आकर नर्सिंग स्टाफ से कहने लगा कि इस मरीज को तत्काल यहां से हटाओ, इसका इलाज मेरे अस्पताल में नहीं किया जाएगा। चिकित्सक के दुर्व्यवहार व इलाज नहीं करने की बात सुनकर उनके साथ गई पत्नी सहित अन्य हतप्रभ रह गए और मरीज का इलाज करने निवेदन किया, लेकिन हठधर्मिता का परिचय देते हुए उन्हें मरीज के साथ जबरन भगा दिया गया। जब उन्होंने जमा की गई राशि, प्रिसक्रिप्सन स्लिप एवं मेडिसिन की मांग की तो चिकित्सक उनके पुत्री की फाइल को अपने चेम्बर में ले गए और फाइल देने व जमा राशि वापस करने से मना कर दिए, दवा देने से भी इंकार कर दिया। जब उनकी पत्नी के द्वारा अन्य अस्पताल में इलाज कराने के लिए फाइल की फोटोकापी मांगी गई तो काफी आग्रह के बाद प्रिसक्रिप्शन स्लिप का मोबाइल से फोटो खींचने दिया गया। पुत्री को लगाए गए स्लाइन को भी निकाल दिया गया।
शिकायत के बाद भी नहीं की गई कार्रवाई
न्यायालय में दायर किए गए परिवाद पत्र में उल्लेख किया गया है कि अस्पताल के प्रबंधक, संचालक ने यह जानते हुए कि आवेदक की पुत्री को तत्काल प्लेटलेट्स एवं ब्लड की आवश्यकता थी, इसके बाद भी मरीज के जान की परवाह किए बगैर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करते हुए इलाज करने से मना किया गया एवं मरीज को अस्पताल से निकाला गया। यह कृत्य भारतीय दण्ड संहिता की धारा 270 के तहत दण्डनीय अपराध के दायरे में आता है। चिकित्सक के द्वारा अमर्यादित एवं अपमानित शब्दावली का सरे आम उच्चारण करते हुए अन्य मरीजों एवं उनके परिजनों की उपस्थिति में मानसिक रूप से प्रताड़ित एवं अपमानित किया गया, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294 एवं 500 के तहत दण्डनीय अपराध के दायरे में आता है। इलाज के उपरांत थाना गांधीनगर में इसकी मौखिक एवं लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई, जिस पर साक्ष्य तो पुलिस ने लिया लेकिन प्रस्तुत शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। कलेक्टर सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष भी गुहार लगाई लेकिन कार्रवाई सिफर रही, जिस कारण से अस्पताल संचालक के हौसले बुलंद है।
विद्वान न्यायाधीश ने दिया यह आदेश
आवेदक की ओर से अधिवक्ता ने आवेदन के साथ थाना प्रभारी गांधीनगर को दी गई शिकायत की प्रति, डॉ. के.आर. टेकाम की चिकित्सा पर्ची, महावीर अस्पताल का केज्युल्टी स्लिप, ओ.पी.डी. बिल, कैश रिसिप्ट, दवाई इन्वोइस, दयानिधि हॉस्पिटल का पैथालॉजी रिपोर्ट, हॉलीक्रास अस्पताल का डिस्चार्ज समरी एवं अन्य इस्सु रिसिप्ट, तेज ब्लड सेंटर का ब्लड रिक्वीजिशन फार्म, कलेक्टर से की गई शिकायत की प्रति सुमित कुमार हर्षयाना, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया। आवेदन पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद न्यायाधीश ने पाया कि आवेदक की पुत्री के उपचार दौरान डेंगू का लक्षण पाए जाने पर अनावेदक द्वारा संचालित चिकित्सालय में 07/09/2023 को ले जाया गया था। यहां अनावेदक के उपेक्षापूर्ण एवं असावधानीपूर्वक कार्य से आवेदक के पुत्री के जीवन को संकट होना संभावित होना बताया गया है। इस संबंध में आवेदक के द्वारा पुलिस थाना गांधीनगर एवं पुलिस अधीक्षक अंबिकापुर को शिकायत की गई, किन्तु शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। अत: आवेदक की ओर से प्रस्तुत प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 156(3) द.प्र.सं. स्वीकृत किया जाता है तथा थाना प्रभारी गांधीनगर को आदेशित किया जाता है कि वह प्रार्थना पत्र के प्रकाश में उक्त घटना कारित करने वाले पक्षकार के संबंध में जांच करें। जांच के प्रकाश में सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीबद्ध कर नियमानुसार विवेचना किया जाना सुनिश्चित करें तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति दो सप्ताह के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना सुनिश्चित करें। प्रकरण का परिणाम दर्ज कर नियत अवधि में अभिलेख अभिलेखागार प्रेषित किया जाए।

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