श्रीमती सीमा सिंह

इस संभावनाओं से भरे व क्षेत्रों मे किए गए जनसंवाद और एक राजनैतिक धुंधलके में झांकने के प्रयास वाले लेख में आगे बढ़े,यह स्पष्ट करते चले कि।”राजनीति में अंतिम कुछ नहीं होता”एक व्यक्ति के हितार्थ कई व्यक्तियों का उन्माद भरे कोलाहल का नाम”राजनीति”है। इसलिए संभावनाएं और अटकलें भी इसका मार्ग प्रशस्त करती है, इसलिए प्रायः राजनेता पारे सदृश्य होते हैं यदि हम इन्हें हथेली में रखने का प्रयास करें तो इसके नीचे कुछ नहीं मिलता!

  सरगुजा के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं।पाल से पूर्व राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम,लूण्ड्रा से प्रबोध मिंज, भटगांव लक्ष्मी राजवाड़े प्रमुख नाम है। यद्यपि भाजपा के कुछ प्रत्याशियों की घोषणा के बाद अंबिकापुर में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ जिसमें जिसमें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों ने मंच साझा किया। लेकिन भाव-भंगिमा यह संकेत कर रही थी कि, मनोमालिन्य व वैचारिक मत भेद यथावत है।

 भाजपा द्वारा अपने कुछ उम्मीदवारों की घोषणा और कुछ दिनों बाद सिंहदेव स्वीकार करते हैं कि सरगुजा में कांग्रेस के लिए अब पहले जैसी स्थिति नहीं है! इसका लाभ भाजपा को है पर सरगुजा भाजपा इसे भुनाने में अब तक असफल रही।

 भटगांव विधानसभा से भाजपा
की लक्ष्मी राजवाड़े है,इस क्षेत्र में जातिगत समीकरण के आधार पर राजनैतिक सत्ता तय होती है। वर्तमान विधायक पारसनाथ राजवाड़े कुल मिलाकर कर निष्क्रिय अधिक रहे। यह स्थिति भाजपा को फायदा पहुंचा सकती है, क्योंकि सिंहदेव के पुराने विश्वस्त भी भटगांव से दावेदारी कर रहे हैं। यहां टिकट वितरण से पूर्व ही कांग्रेस में मतों का परस्पर अंतर्विभाजन देखा जा सकता है।जो स्थिति आज  लूण्ड्रा में भाजपा के साथ है वहीं स्थिति भटगांव में कांग्रेस के लिए संभावित है । यद्यपि लूण्ड्रा के वर्तमान विधायक डा०प्रीतम राम जनसंपर्क और जनसंवाद में निष्क्रिय रहे।इसका लाभ भाजपा को संभावित था, लेकिन प्रत्याशी बदलने की मांग और जिला भाजपा कार्यालय का घेराव कर,लूण्ड्रा भाजपा ने अपने को स्वयं का अभिमन्यु बना दिया है।
यहां कांटे की टक्कर हो सकती है।
        अंबिकापुर विधानसभा सभा में सिंहदेव अपराजेय है,भले परसा और हसदेव अरण्य की असफलता ही क्यों न उनके साथ हो। ऐसा इसलिए भी कि राजनीति शास्त्र और विज्ञान दोनों ही है,पर इससे कहीं अधिक अधिकांश मतदाता की यह मौलिक राजनैतिक सोच भी है।भले ही वे असफल क्यों न रहे हों।

सीतापुर विधायक सभा से विधायक और मंत्री अमरजीत भगत है पिछले चार बार के विधायक भी हैं। यहां जनजाति समीकरण और व गिरजाघर किसी की जीत के कारण रहे हैं। मंत्री बनने के बाद जनसंपर्क में कटाव और खाद्यान्न भ्रष्टाचार और अन्य स्थानीय समस्याओं ने यहां कांग्रेस के लिए चुनौती पूर्ण इसलिए भी कर दिया है क्योंकि यह सिंहदेव के प्रभाव वाला क्षेत्र है और खाद्यमंत्री, सिंहदेव के प्रबल विरोधी। किसी तीसरे की प्रबल उपस्थिति ही कांग्रेस के जीत हार का कारण बन सकती है।

 पाल विधानसभा सीट से पूर्व राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम भाजपा के उम्मीदवार हैं,तो चर्चित कम विवादित अधिक वृहस्पति सिंह वर्तमान कांग्रेसी विधायक भी हैं और अभी उनके टिकट पर भी असमंजस है। सिंहदेव के प्रति उनके राजनैतिक व्यवहार और बयानों ने उनके प्रति सिंहदेव को अक्षम्य बना दिया है। कुछ भी हो सिंहदेव शालीन व भद्र व्यक्ति हैं। पाल विधानसभा में सिंहदेव की दखल, वृहस्पति सिंह के प्रति रोष और रामविचार नेताम धमक पाल विधानसभा ने सभा भाजपा के लिए पीली बत्ती का संकेत कर दिया है।

प्रेमनगर विधानसभा से वर्तमान विधायक खेलसाय सिंह है,जो सिंहदेव

के पुराने विश्वस्त है, हांलांकि वे अब बुजुर्ग हो चले हैं? अथवा सिंहदेव किसे चाहते हैं प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण रहेगा।यहा गोंड जनजाति में वोट का आंतरिक विभाजन होगा (समाज के नेताओं से वार्ता के आधार पर) जो भाजपा और कांग्रेस दोनों की दिशा तय करेगा। चूंकि खेलसाय सिंह अपने क्षेत्र में सक्रिय कम रहे और पिछले कई बार से क्षेत्र के विधायक रहे हैं।जातीय समीकरण और प्रभाव ही किसी के जीत हार का कारण बनेंगे, यहां भाजपा के लिए संभावनाएं हो सकती हैं। सामरी विधानसभा से विधायक चिंतामणि के लिए असमंजस की स्थिति है।निः संदेह इन क्षेत्रों में सिंहदेव का दखल वर्तमान प्रादेशिक राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकती है।पर सरगुजा भाजपा स्वयं की आंतरिक दुर्बलताओं का शिकार है।

  अंत में राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त के कविता कि यह पंक्ति याद आ रही है,

   “अपनों का है,अंध चुनाव,
     है मकड़ी का जाल बुनाव।
      मतदान माली अनुकूल,
       चुन ले कांटों में फूल।

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