ब्यूरो कार्यालय बलरामपुर

बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर रजखेता में संचालित परख वृद्धाश्रम की हालत इतनी भयावह है कि इसे आश्रम कहना भी बुजुर्गों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
जिस जगह को जीवन की अंतिम सांझ में बुजुर्गों का सहारा बनना था, वही जगह आज अंधेरे, भूख और अपमान की मिसाल बन चुकी है। आश्रम में ताला लटका मिला और भीतर रहने को मजबूर वृद्ध महिलाएं अंधेरे में खुद चूल्हा जलाकर भोजन बनाने को विवश हैं। न भोजन, न रोटी, न सोने की व्यवस्था केवल बेबसी और उपेक्षा।
सबसे चौंकाने वाली और खतरनाक बात यह है कि वृद्धाश्रम से एक्सपायरी दवाइयों का भंडार बरामद हुआ है यह सीधी-सीधी बुजुर्गों की जान से खिलवाड़ है। अगर कोई अनहोनी होती, तो उसका जिम्मेदार कौन होता? समाज कल्याण विभाग या वे अधिकारी जो केवल फाइलों में निरीक्षण कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं प्राप्त जानकारी के अनुसार
पिछले 8 महीनों से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला, जिसके कारण अधिकांश स्टाफ काम छोड़कर जा चुके है। नियमों के अनुसार जहाँ 12 कर्मचारियों का सेटअप होना चाहिए, वहाँ सिर्फ एक कर्मचारी पूरे वृद्धाश्रम को किसी तरह संभाल रहा है। नतीजा यह है कि बुजुर्गों को भोजन, दवा और देखभाल किसी भी मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
सूचना मिलने के बाद तहसीलदार मौके पर पहुँचे और किसी तरह समझाइश देकर ताला खुलवाया गया। अस्थायी तौर पर व्यवस्थाएं तो की गईं, लेकिन सवाल यह है कि क्या बुजुर्गों का जीवन अस्थायी इंतजाम के भरोसे छोड़ा जा सकता है?
यह मामला केवल अव्यवस्था का नहीं, बल्कि प्रशासनिक अपराध का है। ऐसा प्रतीत होता है कि समाज कल्याण विभाग के जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजों में कोरम पूरा कर रहे हैं। जमीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं। निरीक्षण के नाम पर केवल फोटो सेशन, और फिर अखबारों में अपनी तारीफ के समाचार यही विभाग की कार्यशैली बन चुकी है।
वृद्धों की सुरक्षा सम्मान और जीवन से जुड़ा यह मामला अब प्रशासन के लिए एक कड़ी चेतावनी है। यदि अब भी जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ होगा कि शासन की योजनाएं सिर्फ पोस्टर और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित हैं

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