बस का किराया नहीं होने के कारण संजीवन पण्डो अपनी पत्नी व बच्चे के साथ मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रहने था विवश
जिला प्रशासन बलरामपुर ने बीमार पडऩे पर भेजा था मेडिकल कॉलेज अस्पताल, घर जाने के लिए नहीं मिल रही थी मदद


गिरजा ठाकुर
अंबिकापुर। बलरामपुर जिला अस्पताल से प्रशासन की पहल पर रिफर संजीवन पंडो व उसकी पत्नी-बच्चे इलाज के बाद स्वस्थ हो गए, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के पास बस का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे, ऐसे में वे मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में एक माह से पड़े थे। कुछ अन्य पंडो परिवार के सदस्य भी स्वास्थ्य लाभ लेने के बाद अस्पताल में ही समय काट रहे थे। इसकी जानकारी विशेष पिछड़ी जनजाति समाज कल्याण समिति छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष उदय कुमार पंडो को मिली और अस्पताल प्रबंधन के समन्वय से बलरामपुर जिला अस्पताल से एंबुलेंस मंगा इन्हें गृहग्राम के लिए रवाना किया गया। इस पहल के बाद लंबे समय बाद अस्पताल में पड़े पीडि़तों के चेहरे की रौनक बढ़ गई।
जानकारी के मुताबिक बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम आसनडीह निवासी संजीवन पंडो व उसके परिवार के सदस्यों को बेहतर इलाज के लिए बलरामपुर जिला अस्पताल से रेफर करने पर मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में दो सितंबर को भर्ती कराया गया था। यहां इलाज के बाद 13 सितंबर को छुट्टी कर दी गई थी। छुट्टी होने के बाद घर वापस जाने के लिए इनके पास किराया नहीं था, जिस कारण पूरा परिवार अस्पताल में ही समय काटने विवश था। अस्पताल के कर्मचारी इनके लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराने के प्रयास में लगे थे, लेकिन एक माह के अंतराल में इन्हें घर वापसी के लिए एंबुलेंस की सुविधा मिल पाई।  
मालुम होता तो रुपये की व्यवस्था करके आता
संजीवन पण्डो का कहना था कि अस्पताल में खाना तो मिल रहा है लेकिन निजी जरूरतों की पूर्ति कैसे होगी। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद अगर घर-गांव पहुंच गया होता तो कुछ काम करने से मजदूरी मिलती, जिससे वह परिवार के जरूरतों को पूरा करता। किराए के लिए रुपये नहीं होने के कारण अस्पताल में रूकना मजबूरी है। संजीवन का कहना था कि काफी दिक्कतों के बीच लंबा समय वह परिवार के साथ काटने विवश था। बलरामपुर जिले के स्वास्थ्य अमले तक वह अपनी पीड़ा पहुंचाया, लेकिन कोई मदद करने सामने नहीं आया। उसका कहना था कि अगर पहले उसे बताया गया होता कि अंबिकापुर अस्पताल से छुट्टी के बाद घर वापस जाने के लिए सरकारी वाहन की सुविधा नहीं मिलेगी तो वह अपना और बच्चे का इलाज रुपये की व्यवस्था करके कराता।
मुझे 108 से लाकर अंबिकापुर अस्पताल में छोड़ दिया गया है।
ये भी फंसे थे छुट्टी होने के बाद अस्पताल में
मेडिकल कॉलेज अस्पताल में विशेष पिछड़ी जनजाति परिवार के अन्य मरीज भी किराया नहीं होने की स्थिति में फिजूल समय बिता रहे थे। फुलेश्वरी पण्डो, रतन पण्डो, समिक्षा पण्डो, प्रमिला पण्डो भी इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज अस्पताल आए थे, इनके पास भी अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद घर जाने के लिए किराया नहीं था। सभी जिला अस्पताल बलरामपुर से रिफर होकर संजीवनी 108 एंबुलेंस से मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में भर्ती हुए थे।  
बयान-
विशेष पिछड़ी जनजाति के पण्डो एवं पहाड़ी कोरवाओं के इलाज की जिला प्रशासन बलरामपुर के पहल पर बेहतर व्यवस्था की गई है परंतु अस्पताल से छुट्टी होने के बाद घर वापस जाने के लिए इन्हें दिक्कत से जूझना पड़ता है। ऐसे में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद इन्हें घर जाने की सुविधा तत्काल मिले, इसकी पहल होनी चाहिए। एंबुलेंस से ये अस्पताल तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन रुपये के अभाव में घर जाते समय इन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
उदय पण्डो, प्रदेश अध्यक्ष
विशेष पिछड़ी जनजाति समाज कल्याण समिति

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