गिरिजा कुमार ठाकुर
अंबिकापुर। चुनावी वर्ष में हम प्रवेश कर चुके हैं…आचार संहिता लगने में भले देर हो पर लोगों के जुबां चुनावी चर्चा में हिस्सा लेने आतुर हैं। हो भी क्यों ना…शीर्ष में कुर्सी-कुर्सी के लिए तनातनी और मुख्यमंत्री का ताज पहनने के लिए घमासान का नजारा चुनावी वर्ष के पहले तक लोगों ने देखा। मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था की रातों-रात प्रशासनिक तैयारी कभी रायपुर…तो कभी सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में होते रही। नवोदित छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस के तीन साल सत्ता के बाद भाजपा के 15 साल, पुनश्च कांग्रेस को भारी बहुमत से मिली जीत के लिए लगातार हवाई सफर करते सरगुजा से बस्तर तक जनता के बीच पहुंचने वाले अंबिकापुर विधायक व प्रदेश सरकार में मंत्री टीएस सिंहदेव, मुख्यमंत्री बनेंगे, इस उम्मीद पर पूरी तरह से तुषारापात हो गया। दिल्ली में हाईकमान के दरवाजे तक टीएस व भूपेश के बीच मुख्यमंत्री की ताजपोशी के लिए ललकार के बाद ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री की बयार के बाद कार्यकर्ताओं की भी बोलती बंद हो गई। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भूपेश काका के विराजमान होने के बाद ढाई साल बीतने का जनता ने बड़ी बेसब्री से इंतजार किया। ढाई साल पूरा होने को आया फिर एक बार सरगुजा में मुख्यमंत्री हाउस की चर्चा बाजार से नुक्कड़ों तक होने लगी। नीयत समय बीतने के बाद टीएस सिंहदेव का मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का इंतजार करते साढ़े चार साल बीत गए।
इस बीच अंबिकापुर विधायक व प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टीएस का बातों-बयानों के बीच मुख्यमंत्री का दायित्व नहीं मिलने का दर्द कई बार छलका। इसे लेकर तरह-तरह की टीका टिप्पणी भी हुई, पर भूपेश काका ने ना जाने ऐसा क्या करिश्मा कर दिखाया कि उनके सरगुजा की सरजमीं पर आगमन के बीच प्रदेश ही नहीं दिल्ली तक जय-वीरू के नाम से मशहूर जोड़ी साथ ही नजर आई। जिन विधायक की ताजपोशी के लिए पूरा दमखम टीएस सिंहदेव ने झोंका, वे भी धीरे-धीरे पिछले, अगले दरवाजे से भूपेश काका के मुरीद हो लिए। टीएस सिंहदेव की जी-हुजूरी में जिन्होंने पूरा समय बिताया, उनके पासा पलटने का परिदृश्य काफी दिनों तक पर्दे के पीछे नहीं रह पाया। इसके बाद भी ऐसा नहीं है कि सभी ने इनका साथ छोड़ दिया, इन्हें मालूम है कि टीएस बाबा का साथ छोड़ना, पंजा से हाथ धोना और अपनी साख पर बट्टा लगाना भी साबित हो सकता है। इन हालातों के बीच एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सत्ता के शीर्ष पर कौन विराजमान होगा, इसे लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। अब चर्चा इस बात की नहीं हो रही है कि छत्तीसगढ़ के आगामी विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का ताज टीएस पहनेंगे या भूपेश… बल्कि कांग्रेस के दिग्गजों की अंदरूनी टसक और बनते-बिगड़ते समीकरण के बीच प्रदेश स्तर पर कहीं विपक्ष न भारी पड़ जाए, इसके गाल बज रहे हैं, इसके पीछे कारण कांग्रेस…भाजपा के अलावा और किसी पार्टी का छत्तीसगढ़ में पैठ नहीं बना पाना भी है।
स्थानीय प्रत्याशी के मामले में भाजपा कमजोर
स्थानीय स्तर पर बात करें तो प्रत्याशी के मामले में भाजपा कमजोर नजर आ रही है। दावेदार तो ऐसे भी हैं, जो इंटरनेट मीडिया में अपनी प्रबल दावेदारी और जीत तक की कथा बांच चुके हैं। नए चेहरे को देख वोटर करवट बदल भी सकते हैं, पर अंबिकापुर विधानसभा में टीएस सिंहदेव के प्रत्याशी बतौर सामने रहते पासा पलटना नामुमकिन ही नजर आ रहा है। इसके पीछे कारण टीएस सिंहदेव का सौम्य व सरल स्वभाव ही नहीं, बल्कि किसी मसले का त्वरित निराकरण हो इसकी पहल करना भी है।
जनाधार विहीन लोगों से घिरे रह गए प्रबल प्रतिद्वंद्वी
पिछले विधानसभा चुनावों में टीएस सिंहदेव के प्रतिद्वंद्वी रहे अनुराग सिंहदेव की बात करें तो जनता ने उन्हें पहले चुनाव में जो प्रतिसाद दिया, उस अनुरूप अगले चुनाव में वोटों के अंक में बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन हार-जीत का आंकड़ा अप्रत्याशित रूप से टीएस सिंहदेव के पक्ष में बढ़ा, जिसका क्रम बरकरार रहा। टीएस के प्रतिद्वंदी में कमी यह भी सामने आई कि हार के बाद उनकी जनता से दूरी बनी रही या कहा जाए चुनाव परिणाम सामने आने के बाद मतदाताओं का आभार प्रदर्शन करने मात्र को उन्होंने अपना दायित्व समझा और जनाधार विहीन लोगों से घिरे रह गए।

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