महाराज सरगुजा के द्वारा शुरू कराया गया उर्स आज भी कायम है

रोमी सिद्दीकी

अम्बिकापुर –  आदिवासी बाहुल्य सरगुजा की पावन भूमि की फिजाऐ अलौकिक शक्तियों व पीर फकीरों की आशिर्वाद व दुआएँ आदिकाल से सराबोर है यही कारण है कि सरगुजा की पावन धरती में जो भी एक बार आया वह यही का रह गया फिर वह कभी लौट कर वापस नहीं गया इसके अनेकों उदाहरण है क्योंकि यह धरती आपको मान सम्मान, धनसंपदा, वंश वृद्धि सहित सभी चीजो से नवाज़ती है…. मानव तो मानव जानवर भी इनके चौखट से खाली नहीं लौटते है सरगुजा संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर  से महज चार किलोमीटर की दूरी में स्थित वन आश्रित ग्राम तकिया है जोकि मुस्लिम समुदाय का बड़ा मुक्कदश स्थान है यहा पर जिंदा वली हजरत सैय्यद बाबा मुरादशाह व हजरत सैय्यद बाबा मौहब्बत शाह वली रहमतुल्लाह वश.का मजार शरीफ है आप दोनों भाई है और आप के साथ तोता मुबारक का मजार भी है.. आप को हम बता दे कि यह एशिया महाद्वीप एक मात्र ऐसा मजार है जहाँ पक्षी का मजार है ऐसा कहा जाता है.. बहरहाल मेरे दादा मरहूम अब्दुल शक्कुर चुकि अम्बिकापुर के सबसे पुराना व मौजूद समय का सबसे बड़ा जय स्तंभ चौक स्थित जामा मस्जिद के पहले सदर प्रमुख थे इस लिए धार्मिक कार्यक्रमों जिसमें तकिया शरिफ का उर्स मुबारक के आयोजन का जिम्मा भी जामा मस्जिद का रहता था और आज भी इस आयोजन सम्पूर्ण जिम्मेदारी जामा मस्जिद प्रबंधन का देखरेख में होता है इस लिए उर्स व मजार के बारे में बचपन से ही काफी बातें सुनने को मिला है वही अक्सर पीर फकीर जो अम्बिकापुर से गुजरते तो उनसे भी कुछ बातें सुनने को मिलता था… की तकिया के बाबा बड़े दयालु व सबकी सुनने वाले है यहाँ सच्चे अंतर आत्मा से यहा मांगी गई मुराद जल्द पुरी होती है जो सत्य है.सरगुजा की पावन धारा में आप दोनों भाईयों का कब आना हुआ इसकी सही सही तारिख किसी को पता नहीं है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक तकिया का यह मजार लगभग  पांच सौ साल से भी ज्यादा पुराना है कहने का मतलब यह है कि बताया जाता है कि वर्षों पूर्व आप दोनों भाई सरगुजा के घनघोर जंगल से से गुजर रहे थे तब एक घटना सामने आया जिसमें कुछ अदृश्य काली शक्तियां क्षेत्र के ग्रामीणों को काफी परेशान कर थी  जिसके कारण गांववासी परेशान थे और वे इससे मुक्ति के ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे ग्रामीणों ने दोनों पीर बाबाओं से इस परेशानी से राहत देने की गुजारिश की अंततः पीर बाबा ने क्षेत्र में डर का पर्याय बने काली शक्तियों से ग्राम वासियों को छुटकारा दिलाया इसके बाद वे जाने लगे तो ग्रामीणों ने उनसे आग्रह किया की वे यही रहे और उन्हें आशीर्वाद देते रहे..ग्रामीणों के लगातार आग्रह करने से दोनों बाबा यही रह गए….

उर्स की शुरुआत……….. ग्राम तकिया में उर्स की संभवतः  देश की आज़ादी से पहले से मनाया जाता है जिसकी शुरुआत  सरगुजा स्टेट के महाराजाओं के द्वारा प्रारंभ किया गया था लेकिन तरिका अलग था मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों की माने तो महाराज सरगुजा पीर बाबा की मजार के पास उर्स के दिन बैठ जाते थे वह भी सादा लिबास में उसके बाद गांव वासियों को भोजन कराते हुए सभी को एक-एक चांदी का सिक्का उपहार स्वरूप देते थे दिन भर चलने वाले कार्यक्रम सूरज ढलने तक समाप्त हो जाता था क्योंकि सूरज ढलने के बाद ग्राम तकिया के जंगलों में रहने वाले खूंखार जानवर  मजार की ओर रुख करते थे इसे देखते हुए सूरज ढलने से पहले ही आम ग्रामीणों  को मजार छोड़ देने का आदेश महाराज सरगुजा के द्वारा पहले से दे दिया गया था ताकि कोई घटना ना घट सके…..

सदभावना ग्राम तकिया…….

ग्राम तकिया को सदभावना ग्राम का दर्जा की भी एक रोचक कहानी है आप कभी मजार  शरीफ जाएं तो आपको मजार के ठीक बगल में एक वनदेवी का भी मंदिर भी देखने को मिलेगा यह मंदिर काफी प्राचीन है यहां रखे मूर्तियों के अवशेष आज भी अस्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं यह मंदिर आम मंदिरों की तरह नहीं है यह मंदिर पूर्णता खुली हुई है माना जाता है जनजाति समुदाय के लोगों के द्वारा इसका निर्माण कराया गया था इस मंदिर में भी सरगुजा स्टेट के समय से जनजाति समुदाय के लोगों के द्वारा पूजा अर्चना की जाती है उर्स के समय दोनों ही समुदाय के लोगों का संगम सरगुजा के इस धरती पर होता है इसलिए इसे सद्भावना ग्राम का दर्जा तत्कालीन महाराजाओं के द्वारा दिया गया था……

हिंदू- मुस्लिम एकता का प्रतीक है उर्स का आयोजन…..

आप को यह जानकर हैरत होगा कि पीर बाबाओं के मजार में सदियों से उर्स का आयोजन होता आ रहा है जिसकी शुरुआत सरगुजा स्टेट के  हिन्दू महाराजाओं ने शुरू करवाया उस समय यहा शायद ही कोई मुसलमान रहा होगा लेकिन आजादी से ठीक पहले व्यवसाय व महाराज सरगुजा के द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए जब लोगों को यहां बुलाया गया तो उसमें मुसलमान समुदाय के लोग भी यहां पहुंचे जो धीरे-धीरे यहीं बस गए…बाद में उनको ही सरगुजा स्टेट के द्वारा इसकी जिम्मेदारी दे दी गयी….. मजार शरीफ़ में जितनी आस्था मुस्लिम समुदाय का है उससे कहीं ज्यादा हिंदू समुदाय का भी आस्था इस मजार से जुड़ा हुआ है यही कारण है कि उर्स में दोनों समुदाय के लोग मिलजुलकर यहां उत्सव मनाते हैं और उर्स में मुख्य अतिथि के रूप मे आज भी हिन्दू समुदाय के लोगों को प्रमुखतः दिया जाता है…… !

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