तरेरती आंखों का टूट पडेंगा कहर, मोबाइल, कैमरे से करना पड़ेगा डिलीट

गिरिजा कुमार ठाकुर

छ.ग.फ्रंटलाइन –  अंबिकापुर। वैश्विक एकजुटता की कोशिश के पहले हसदेव अरण्य का दिनोंदिन सफाया हो रहा है। सुरक्षा घेरे में जंगल क्षेत्र के बड़े हिस्से का सफाया करने के बाद भी मनमानी थमी नहीं है। अगर किसी ने यहां पहुंच कर सेल्फी लेने या वीडियो बनाने की कोशिश की, तो उन पर तरेरती आंखों का कहर टूट सकता है। इधर पेड़ों के कटने से ग्रामीण सिर्फ क्षुब्ध नहीं हैं, बल्कि उनके रग-रग में बसे वन्य क्षेत्र का विनाश कैसे थमेगा, कौन इसका माध्यम बनकर उनके बीच आएगा, इस आस में रोज एक झोपड़ी में बैठकर समय गुजारते हैं। एक दशक से जंगलों को विनाश से बचाने इनके धरना का सिलसिला गांव की सीमा में चल रहा है। पुश्तों से वे जहां निवास कर रहे हैं, वहां पेड़ों का सफाया कर काला हीरा निकालने की पुरजोर कोशिश करते बड़े हिस्से को कब्जे में ले भी लिया गया। हसदेव अरण्य अंतर्गत सरगुजा के परसा ईस्ट केते में खनन की मंजूरी देने के बाद इसका यहां के रहवासियों को क्या लाभ मिला, यह आज भी सवालों के घेरे में है।

‘छत्तीसगढ़ फ्रंटलाइनÓ की ‘एफ न्यूजÓ टीम ने हाल में जब इस क्षेत्र का भ्रमण किया, तो ऐसी कई हकीकत निकल कर सामने आई, जो आजाद भारत के छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों के लिए काला दिन ऐसा इतिहास लिखते नजर आ रही है। यहां के महिला-पुरूष न सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं बल्कि शिक्षा के नाम पर दिए गए भवन में मिल रही शिक्षा के स्तर पर भी उंगली उठा रहे हैं। वन्य क्षेत्र के पतन के बाद पर्यावरण विनाश के कुप्रभाव की चिंता भी इन्हें सता रही है। धनाढ्यों को लाभ पहुंचाने चल रही कोशिश से किसी को सरोकार हो या न हो, ग्रामीणों को है। वे अपने पूरे परिवार के साथ रोजाना इसी चिंता को लेकर झोपड़ी में धरना देते आ रहे हैं। 2023 की विदाई की बेला में उन्होंने जंगलों के विनाश के लिए पुलिस व प्रशासन के द्वारा उठाए गए कदम का जो रूख देखा है, वह इन्हें चिंता में डाल दिया है। जिस जंगल से वे वन संपदा एकत्र करके रोजी-रोटी की व्यवस्था करते आ रहे थे, वह नेस्तनाबूत होते जा रहा है। नजरबंद जैसे हालातों के बीच रहने के बाद अपने गांव-घर से लगे वनों के विनाश का परिदृश्य देख चुके ग्रामीण वनोपज पर आधारित अर्थव्यवस्था के नष्ट होने का दंश लिए बैठे हैं, जो इन्हें अंदर ही अंदर टीस रहा है। इन सबके बीच पुन: हसदेव के जंगल को बचाने के उद्देश्य से वैश्विक एकजुटता की कोशिश चल रही है।

 

एनआरआई, वकील, पर्यावरणविदों सहित 10 से अधिक देशों के एक सौ से अधिक सामाजिक कार्यकर्ता वर्चुअल बैठक में हसदेव को खतरे में डालने वाले खतरनाक सरकारी कॉर्पोरेट के गठजोड़ को लेकर चर्चा कर रहे हैं। अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला व हसदेव अनुसंधान में विशेषज्ञ बिपाशा पॉल ने आदिवासियों के सामने आने वाली विभिन्न तकनीकी चुनौतियों से अवगत कराते हुए कहा है कि मध्य भारत के फेफड़े के रूप में पहचाने जाने वाले हसदेव वन को विनाशकारी खनन व क्षेत्र के समृद्ध खनिजों का दोहन करने वाले गिरोह जैसे खतरे का सामना करना पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए आर्थिक विकास, स्वास्थ्य देखभाल और रोजगार को बढ़ावा देने की जंगल की क्षमता के बावजूद, राज्य इसके लाभों से वंचित है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ समृद्धि के चौराहे पर खड़ा है। सरकार के अनुचित संरक्षण में बाहरी संस्थाओं ने अनुचित तरीकों से इन संसाधनों का शोषण शुरू किया है, जिसने स्थानीय लोगों को नुकसान में डाल दिया है। इन्होंने हसदेव जंगल के विनाश के खिलाफ लड़ाई को एक जन आंदोलन में बदलने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

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