टीएस सिंह देव ने एफएसी कमेटी के सदस्यों का महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर ध्यानाकृष्ट कराया

 

अंबिकापुर। केंद्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (एफएसी) की बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित और अदानी के एमडीओ वाली केते एक्सटेंसन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति देने पर विचार होना है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार पूर्व में ही वन स्वीकृति की अनुशंसा केंद्र को भेज चुकी है। इस नए खदान में लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाएंगे जिससे न सिर्फ समृद्ध जंगल-जमीन, जैव विविधता, हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा, बल्कि छत्तीसगढ़ रेगिस्तान में तब्दील होगा। इसी क्रम में फारेस्ट एडवायजरी कमेटी की शुक्रवार को नई दिल्ली में 8 मई को हुई बैठक के पहले छत्तीसगढ़ के पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने कमेटी से जुड़े सदस्यों से फोन कॉल पर बात की और ईमेल व वाट्सएप से कई दस्तावेज भेज कर ऐतिहासिक स्थल रामगढ़ के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में पहल करते हुए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है, जिसके माध्यम से केते एक्सटेंशन कोल माइन जो हसदेव अरंड कोल फील्ड्स का हिस्सा है, के लिए फारेस्ट क्लीयरेंस नहीं देने अथवा रिजेक्ट करने की मांग की है।

पूर्व उपमुख्यमंत्री ने कहा है कि भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने एनजीटी के आदेश पर 2021 में अपनी रिपोर्ट हसदेव अरण्य कोयला क्षेत्र, छत्तीसगढ़ में चुनिंदा जीव समूहों पर विशेष ज़ोर के साथ जैव विविधता का आंकलन (खंड-2) सौंपा था। इस रिपोर्ट में डब्ल्यूएलएल ने साफ तौर पर यह सिफारिश की है कि पीईकेबी-1 को छोडक़र, बाकी सभी नई खदानों के लिए केते एक्सटेंशन को खनन के लिये नो गो एरिया घोषित किया जाए। यहां तक कि आईसीएफआरई, देहरादून द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पूरे हसदेव-अरण्य कोयला क्षेत्र में जैव विविधता का अध्ययन, जिसमें छत्तीसगढ़ के तारा, परसा, परसा ईस्ट और कांता बासेन, और केते एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक शामिल हैं (खंड-1, 2021) में भी साफ तौर पर यह सुझाव दिया गया है कि वे सभी कोयला ब्लॉक जो ‘चोरनाई वाटरशेड’ का हिस्सा हैं, हसदेव नदी के लिए एक बेहद जरूरी जलग्रहण क्षेत्र है। वहां खनन पर पूरी तरह से रोक लगा दी जानी चाहिए। ‘केते एक्सटेंशन’ कोयला ब्लॉक का 90′ इलाका ‘चोरनाई वाटरशेड’ के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद, इस इलाके में खनन की अनुमति किसी भी पर्यावरणीय आधार पर नहीं दी जा रही है, बल्कि सिर्फ इसलिए दी जा रही है क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इसे मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में है, जो कि पूरी तरह से गलत और अनुचित है। ऐसे सभी बिंदुओं के आधार सहित प्रधानमंत्री कार्यालय को इस संबंध में पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंह देव द्वारा भेजी गई समस्त दस्तावेज की कॉपी भेजते हुए आग्रह किया गया है कि, ऐतिहासिक रामगढ़ स्थल के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है। पूर्व उपमुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई है कि, फारेस्ट एडवायजरी कमेटी इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करेगी और ऐतिहासिक स्थल रामगढ़ को संरक्षित करने हेतु आवश्यक कदम उठायेगी।

रामगढ़ की प्राचीन गुफाओं और मंदिर को खतरा

पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने फोन कॉल पर तथा दस्तावेजों के माध्यम से जो बात रखी है उनमें प्रमुख रूप से कहा है कि, 1,742.155 हेक्टेयर जंगल की जमीन माइनिंग के लिये इस्तेमाल की जायेगी, जिससे लगभग 7 लाख से ज्यादा पेड़ काटे जायेंगे, जो एक पुराने और साफ-सुथरे जंगल का हिस्सा है। साथ ही उन्होंने कहा है कि इस इलाके में माइनिंग की वजह से पास की रामगढ़ पहाडिय़ों में कई दरारें आ गई हैं, जो एएसआई के सेंट्रल प्रोटेक्टेड स्मारक का हिस्सा है। पहाड़ी की एरियल दूरी 8 किलोमीटर है, लेकिन रिपोर्ट में इसे गलत तरीके से खनन स्थल से 10 किलोमीटर से ज्यादा दूर बताया गया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि खदान की दूरी पहाड़ी के सबसे पास वाले किनारे से नहीं, बल्कि सबसे दूर वाले किनारे से मापी गई थी, जहां प्राचीन गुफाएं मौजूद हैं। अगर यह पहाड़ी गिर जाती है, तो रामगढ़ की प्राचीन गुफाएं और मंदिर भी इसके साथ ही नष्ट हो जाएंगे।

‘लेमरू हाथी अभ्यारण्य’ का है सुरक्षित सीमा  

पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने यह भी कहा है कि यह जंगल हाथियों के रहने के लिए एक बेहद अहम जगह है और ‘लेमरू हाथी अभ्यारण्य’ के बफर जोन (सुरक्षित सीमा) में आता है। इस इलाके में खनन शुरू होने के बाद, यानी 2014 के बाद से, इस क्षेत्र में इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष की घटनाएँ काफी बढ़ गई हैं। उन्होंने फारेस्ट एडवायजरी कमेटी का ध्यान इस ओर भी आकृष्ट किया है कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा के हसदेव अरंड कोयला क्षेत्र में कोयला खनन के खिलाफ और नई कोयला खदानों को रद्द करने के खिलाफ एकमत से प्रस्ताव पारित किया गया। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट को दिए एक एफिडेविट में छत्तीसगढ़ के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने कहा है ‘अभी चल रही पीईकेबी माइन में अभी भी 350 मिलियन टन कोयले का डिपॉजिट है, जिसकी माइनिंग होनी बाकी है। यह डिपॉजिट लगभग 20 सालों तक 4340 एमडब्ल्यू के लिंक्ड पावर प्लांट्स की पूरी कोयले की डिमांड को पूरा करने के लिए काफी है। इसलिए माइनिंग के लिए कोई नया माइनिंग रिजर्व एरिया देने और इस्तेमाल करने की कोई जरूरत नहीं है।

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