रायपुर। महीने भर से चल रहे के बस्तर ओलंपिक का आज समापन हो रहा है। इस बार खास बात यह है कि एक पूर्व नक्सली, जिसका नाम भी हिड़मा है, अब बंदूक की जगह तीर-कमान से निशाना लगा रहा है। यह हिड़मा, जो मृत माओवादी कमांडर हिड़मा के इलाके से है, अब ‘नुवाबात’ (नया रास्ता) टीम का हिस्सा है। इस टीम में पूर्व नक्सली और हिंसा के शिकार लोग शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज जगदलपुर में इस समापन समारोह में शामिल होंगे।

समझ आ रहा आजादी का मतलब
यह हिड़मा, जिसका पूरा नाम मुचकी हिड़मा है, सुकमा जिले का रहने वाला है और इसी साल उसने सरेंडर किया है। वह कहता है, “मैं हिड़मा हूं, पर वो वाला हिड़मा नहीं। मैं मुचकी हिड़मा हूं, सुकमा जिले से। मैंने इसी साल सरेंडर किया है। अब मैं तीरंदाजी से अपने निशाने पर वार करूंगा।” वह बताता है कि अब उसे आज़ादी का मतलब समझ आ रहा है, क्योंकि अब उसे छिपना या इंसानों को निशाना बनाना नहीं पड़ता।

बस्तर ओलंपिक एक खेल प्रतियोगिता नहीं, नया मौका है
बस्तर ओलंपिक सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक नया मौका है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ा है या हिंसा के शिकार हुए हैं। इस बार 700 से ज़्यादा सरेंडर किए हुए नक्सली और हिंसा से प्रभावित लोग एथलेटिक्स, कबड्डी, खो-खो, तीरंदाजी और पारंपरिक खेलों में हिस्सा ले रहे हैं।

किसान परिवार से है मुचकी हिड़मा
मुचकी हिड़मा ने बताया कि उसका परिवार बड़ा था और खेती से गुज़ारा मुश्किल था। जंगल के कारण खेती का रकबा भी नहीं बढ़ा सकते थे। ऐसे में जब नक्सलियों ने उसे बुलाया तो वह उनके साथ चला गया। शुरुआत में बंदूक चलाना उसे रोमांचक लगा। लेकिन जब लड़ाई बढ़ी तो उसने सोचा कि वह इस दलदल से कैसे निकलेगा।

3.9 लाख लोगों ने कराया रजिस्ट्रेशन
बस्तर ओलंपिक छत्तीसगढ़ के सात नक्सल प्रभावित जिलों में आयोजित किया गया है। इसमें स्थानीय लड़के-लड़कियां भी गांव, ब्लॉक और फिर डिविजन स्तर पर भाग लेते हैं। इस साल करीब 3,500 फाइनलिस्ट जगदलपुर पहुंचे हैं। कुल मिलाकर 3.9 लाख से ज़्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया, जिनमें 2.3 लाख महिलाएं थीं। यह पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज़्यादा है।

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