राजेंद्र ठाकुर (राजू)ब्यूरो कार्यालय बलरामपुर
बलरामपुर शासन-प्रशासन गांव-गांव तक सड़क, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लाख दावे करता है, लेकिन बलरामपुर जिले के कुसमी विकासखंड से सामने आई एक तस्वीर इन तमाम दावों पर सवाल खड़े करने के लिए काफी है। ग्राम पंचायत अमरपुर के भैसापाठ-घुइझरिया बस्ती में एक बुजुर्ग महिला की तबीयत बिगड़ने के बाद ग्रामीणों को उन्हें झेलगी में टांगकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा, तब जाकर वह मुख्य मार्ग तक पहुंच सकीं।

दरअसल, बताया जा रहा है कि करीब 50 वर्षीय रदनी की सोमवार सुबह अचानक तबीयत बिगड़ गई। परिजनों ने उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी की, लेकिन बस्ती तक पहुंचने के लिए पक्की और सुगम सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस सहित कोई भी वाहन गांव तक नहीं पहुंच सका। मजबूर होकर ग्रामीणों ने झेलगी का सहारा लिया और दो लोगों ने बुजुर्ग महिला को कंधे पर टांगकर लगभग दो किलोमीटर का सफर तय किया।

सवाल यह है कि आखिर यह कैसी विकास व्यवस्था है, जहां बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि ग्रामीणों के कंधे ही सहारा बनते हैं?

ग्रामीणों के मुताबिक इस मार्ग पर लंबे समय से पुल और बेहतर सड़क की मांग की जा रही है। ग्रामीणों ने कई बार अपनी समस्या जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभाग के अधिकारियों के सामने रखी, लेकिन उनकी समस्या अब तक जस की तस बनी हुई है। नतीजा यह है कि बरसात के दिनों में स्थिति और भी बदतर हो जाती है और आपात स्थिति में ग्रामीणों की जिंदगी सीधे खतरे में पड़ जाती है।

करोड़ों की योजनाएं, लेकिन गांव तक सड़क नहीं!

एक तरफ शासन की ओर से प्रधानमंत्री जनमन योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से विशेष रूप से पिछड़े और दूरस्थ क्षेत्रों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बात कही जाती है। दूसरी तरफ अमरपुर के भैसापाठ-घुइझरिया की यह तस्वीर सवाल करती है कि आखिर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ जमीन पर रहने वाले ग्रामीणों तक कब पहुंचेगा?

कागजों में सड़कें बन रही हैं, योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं और सरकारी तंत्र विकास के आंकड़े गिनाने में पीछे नहीं है। लेकिन जब किसी बीमार बुजुर्ग को अस्पताल पहुंचाने के लिए कंधों का सहारा लेना पड़े, तो फिर विकास के इन दावों की हकीकत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मजबूरी की तस्वीर नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। आखिर जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि कब इन दुर्गम बस्तियों की सुध लेंगे? क्या किसी बड़ी दुर्घटना या किसी ग्रामीण की जान जाने के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी?

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