सीएसपीडीसीएल के चीफ इंजीनियर, एसई और ठेकेदार के खिलाफ कोतवाली में एफआईआर, 1 साल बाद भी नहीं हुई गिरफ्तारी

अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी लिमिटेड अंबिकापुर में करोड़ों रुपये के फर्जी ईपीएफ-ईएसआईसी घोटाले के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने पुलिस को 4 सप्ताह के भीतर विवेचना पूरी कर अंतिम प्रतिवेदन चालान पेश करने का आदेश दिया है।

एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी गिरफ्तारी नही होने और चालान पेश न करने से नाराज होकर आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ. डीके सोनी ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी।

करोड़ों के गोलमाल के मामले में कोतवाली पुलिस ने एफ़आईआर क्रमांक 282/2025, धारा 409, 419, 420, 467, 468, 471, 120 बी आईपीसी का मामला चीफ इंजीनियर, सीएसपीडीसीएल अंबिकापुर, सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर और ठेकेदार प्रभोजत सिंह भल्ला मेसर्स आरके एसोसिएट, मैट्रिक्स सर्विस गुरुकृपा ग्रुप के विरुद्ध दर्ज किया है।

घोटाले का तरीका

फर्जी उपस्थिति: बाह्य स्रोत के भृत्यों और 150 कंप्यूटर ऑपरेटरों की वास्तविक उपस्थिति से अधिक का भुगतान किया गया। 10 भृत्य के नाम पर 13,07,875 से अधिक, 14 भृत्य के नाम पर 4,81,163 से अधिक, 150 कंप्यूटर ऑपरेटर के नाम 1,32,52,783 से अधिक का भुगतान होना सामने आया है।

फर्जी ईपीएफ-ईएसआईसी चालान

नियमों के विपरीत बिना सत्यापन के देयक पारित। ईपीएफ चालान में कूट रचना कर फर्मों को भुगतान किया गया। जिसमें आरके एसोसिएट को 15,05,088 से अधिक, मैट्रिक्स सर्विस को 29,48,036 से अधिक, इस प्रकार कार्यपालन निदेशक की जांच रिपोर्ट के अनुसार 1 करोड़ 82 लाख 86 हजार 907 रुपये का अधिक भुगतान किया गया।

यह था नियम

देयक पारित करने से पहले ईपीएफ-ईएसआईसी जमा का चालान और सत्यापित पे-रोल लगाना अनिवार्य था। लेकिन अधिकारियों ने बिना जांच के ही बिल पास कर दिए।

हाईकोर्ट ने कहा

डॉ. डीके सोनी ने धारा 156(3) के तहत निचली अदालत से एफआईआर कराई थी। एफआईआर के बाद आरोपियों की अग्रिम जमानत भी खारिज हो गई, लेकिन कोतवाली पुलिस ने न गिरफ्तारी की न चालान पेश किया। इस पर डॉ. डीके सोनी बनाम छत्तीसगढ़ शासन में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट बिलासपुर ने दिनांक 3/7/2026 को आदेश दिया कि अपराध क्रमांक 282/25 में चार सप्ताह के भीतर विवेचना पूर्ण कर अंतिम प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने पहले ही माना था कि उपस्थिति पत्रक और ईपीएफ-ईएसआईसी दस्तावेजों का सत्यापन किए बगैर अधिक राशि का भुगतान प्रथम दृष्टया सिद्ध हो रहा है।

सवाल अब पुलिस पर

आरोप गंभीर हैं- शासकीय राशि का सुनियोजित गबन, कूटरचित दस्तावेज और अधिकारियों-ठेकेदार की मिलीभगत। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब देखना है कि कोतवाली पुलिस कितनी जल्दी इस करोड़ों के घोटाले में शामिल बड़े अधिकारियों और ठेकेदार को गिरफ्तार कर चालान पेश करती है।

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