राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और मानव अधिकार आयोग जिम्मेदारों को किया तलब
अंबिकापुर। सरगुजा जिले के मैनपाट में सड़क की बदहाली और एम्बुलेंस की कमी से आदिवासी मांझाी जनजाति परिवार की महिला सोनमती की मौत का मामला दिल्ली तक पहुंचने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग ने सरगुजा कलेक्टर को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है। राष्ट्रीय अजजा आयोग के समक्ष 17 अक्टूबर को मामले की सुनवाई होनी है। ऐसे में जिला प्रशासन की ओर से एडिशनल कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग से सीएमएचओ जवाब पेश करने दिल्ली पहुंचेंगे।
पार्षद आलोक दुबे ने आयोग को भेजे गए आवेदन दिनांक 01 अगस्त 2023 में बताया था कि मैनपाट क्षेत्र के कई गांव आज़ादी के 76 साल बाद भी सड़क और एम्बुलेंस की सुविधा से वंचित हैं। गर्भवती महिलाओं को प्रसव के समय अस्पताल तक पहुंचने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। 27 जुलाई 2023 को मैनपाट विकासखण्ड के ग्राम पंचायत बिसरमनी क्षेत्र में एक महिला को प्रसव पीड़ा हुई, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंच पाई। स्वजन उसे डोली और बांस के भार के मदद से अस्पताल पहुंचाने का प्रयास किए। रास्ते की दुर्गमता और समय पर मदद नहीं मिलने से महिला की हालत बिगड़ती चली गई और वह दम तोड़ दी। इसी गांव की एक अन्य महिला सोनमती, जो मांझी जनजाति से थी, उसकी भी अस्पताल नहीं ले जा पाने के कारण मौत हो गई। छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग, रायपुर ने इसे गंभीरता से लेते हुए 18 सितंबर 2024 को सरगुजा कलेक्टर को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि आवेदन के संदर्भ में की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर आयोग को भेजी जाए। आयोग ने इसे मानव अधिकार उल्लंघन का गंभीर मामला मानते हुए जिला प्रशासन को तत्काल प्रभाव से जांच करने के निर्देश दिए हैं।
इधर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने कलेक्टर सरगुजा को नोटिस जारी करके कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 338 (क) के अधीन प्रदत्त शक्तियों के अनुसरण में उक्त उल्लिखित प्रकरण का अन्वेषण करने का निश्चय किया है। अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने प्रकरण में अन्वेषण, जांच की कार्रवाई के लिए आयोग मुख्यालय में 17 अक्टूबर को सुनवाई की तिथि निर्धारित की है। उक्त तिथि एवं समय पर मामले से संबंधित संपूर्ण तथ्यों एवं सभी सुसंगत मूल अभिलेखों, दस्तावेजों के साथ व्यक्तिगत रूप से अध्यक्ष के समक्ष परीक्षण के लिए उपस्थित होना सुनिश्चित करने कहा गया है। बैठक में उपस्थित नहीं होने पर, आयोग के समक्ष इनकी उपस्थिति को बाध्यकारी बनाने के लिए, आयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 338 क के खंड (8) क के अधीन प्रदत्त सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है, उल्लेख किया गया है।

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