वन्दना दत्ता ने 19 मई 2015 को रात्रिकालीन भोजन सेवा की रखी थी नींव,10 वर्ष पूर्ण होने पर कटा केक
अंबिकापुर। शहर के कलेक्टर बंगला के सामने स्थित कंपनी बाजार में बने व्यवसायिक शेड में डेरा डालने वालों के लिए सोमवार, बुधवार और शुक्रवार, खास दिन रहता है। हर सप्ताह निर्धारित दिन में रात्रिकालीन भोजन कराने के लिए महिलाओं का समूह स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ निकल पड़ता है और जरूरतमंदों और नि:शक्तजनों को भोजन कराता है। घर-घर से बनकर आने वाले गरमा-गरम खाने में सिर्फ शाकाहारी व्यंजन नहीं होता बल्कि मांसाहार खाने वालों को कई बार बिरयानी, अंडा करी भी परोसा जाता है, जिसे वे चाव से खाते हैं। यह सिलसिला चलते 19 मई 2025 को 10 वर्ष पूरे हो गए। इस विशेष अवसर पर शुक्रवार, 23 मई को केक कटा और जरूरतमंदों को भोजन करवाया गया, जो देर शाम तक चला। महिलाओं ने बकायदा परोसकर इन्हें खाना खिलाया और स्वच्छता सहित गर्मी के मौसम को देखते हुए खानपान में विशेष ध्यान देने कहा।
जरूरतमंदों व नि:शक्तजनों के लिए रात्रिकालीन भोजन सेवा की शुरूआत 19 मई 2015 को वरिष्ठ समाजसेविका वन्दना दत्ता ने की, जो अनवरत चल रहा है। वन्दना बताती हैं कि एक बार घर में काफी भोजन शेष रह जाने पर वे इसे फेंकने के बजाए जरूरतमंद को देने के लिए उनके घर में रहने वाली जयंती के साथ कंपनी बाजार की ओर निकल गईं। झोले में रखे खाद्य पदार्थ को देखने के बाद यहां रहने वाले कई नि:शक्त और भिक्षाटन करने वाले उन्हें आशा भरी नजरों से देखने लगे। इनके साथ बच्चे भी थे, जो उनके करीब आ गए। जब उन्होंने साथ में लाए भोजन को बांटना शुरू किया, तो उनके इर्द-गिर्द काफी लोग जमा हो गए। इसके बाद उन्होंने कंपनी बाजार के शेड में रहने वाले ऐसे जरूरतमंदों को हर सप्ताह सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को रात्रिकालीन भोजन की सेवा देने की ठान ली। इस संबंध में साथी महिलाओं से ग्रुप में चर्चा करने और सभी की सहमति मिलने के बाद 19 मई 2015 को पहली बार सभी महिलाएं अपने-अपने घरों में बनाए गए व्यंजनों के साथ कंपनी बाजार में एकत्र हुईं और शेड में रहने वाले हर जरूरतमंदों और गरीब मुसाफिरों को भोजन कराया। इसके बाद नियत दिन में रात्रिकालीन भोजन सेवा के लिए महिलाओं का समूह सुबह से ही एक्टिव हो जाता है और कौन क्या बनाकर लाएगा, इसके लिए वन्दना दत्ता के मोबाइल में संदेश पहुंचने लगता है। महिलाएं पूरे उत्साह के साथ इस पुनीत कार्य में अपनी भागीदारी निभा रही हैं। शुरू में कई साधन, संपन्न महिलाएं भी इस कार्य में रूचि दिखाईं, जो बाद में समय नहीं मिल पाने या अन्य बातों को आड़े लेकर कन्नी काट लीं। वर्तमान में 20 से अधिक महिलाओं का समूह पूरी तन्मयता के साथ जरूरतमंदों और नि:शक्तों के लिए रात्रिकालीन भोजन सेवा में अपना योगदान देने में लगा है। इनमें से कुछ महिलाएं शहर में नहीं रहती हैं, लेकिन उनके द्वारा प्रति सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को अपना सहयोग किसी न किसी माध्यम से प्रदान किया जाता है।
कोरोनाकाल में भी बना भोजन का पैकेट
वन्दना दत्ता बताती हैं कि कोरोनाकाल की विभीषिका के बीच भी रात्रिकालीन भोजन सेवा की परंपरा बंद नहीं हुई। फर्क यह पड़ा कि पहले महिलाओं का समूह कंपनी बाजार में जाकर जरूरतमंदों को अपने हाथों से परोसकर भोजन कराता था, कोविडकाल के दौरान नगर निगम के कर्मचारियों के सहयोग से भोजन का पैकेट बनाकर वितरण कराया जाने लगा। कई ऐसे परिचित थे, जो कोरोना से पीड़ित हो गए, जिनके घर से बाहर निकलने पर पाबंदी जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी। ऐसे पीड़ितों के भोजन पानी का ख्याल किसी की वन्दना दीदी तो किसी की वन्दना बुआ रखने में कसर नहीं छोड़ीं।
आहार में बिरयानी और अंडा भी
रात्रिकालीन भोजन सेवा के लिए निकलने वाली महिलाओं की टोली में हर धर्म, जाति के लोगों का संगम है। सभी महिलाएं अपने-अपने घरों से सेवई, हलुआ, पूड़ी, चावल, बिरयानी, अंडा करी, रोटी, पोहा, सब्जी, छोला जैसे व्यंजन स्वेच्छा से बनाकर लाती हैं, कुछ होटल संचालकों के द्वारा भी इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग प्रदान किया जाता है। ऐसे में जरूरतमंद और नि:शक्त परिवारों को सप्ताह के इन तीन दिनों की रात में स्वादिष्ट, पौष्टिक और लाजवाब भोजन मिल पाता है। सभी इनके आने की आस देखते रहते हैं। इनके आने की आहट लगते ही सभी अपने ठिकाने से निकलकर इनके इर्द-गिर्द जमा हो जाते हैं।
वृद्धा ऐसे बनी कुम्हड़ा वाली दाई
वंदना दत्ता बताती हैं कि रात्रिकालीन भोजन सेवा के दौरान भिक्षाटन करने वाली एक वृद्ध महिला वर्षों से उनके आने का राह देखती है। एक बार भोजन वितरण के दौरान वह भिक्षाटन में मिले 5 कुम्हड़ा का फल लेकर आ गई, जिसे वह अपने बिस्तर के नीचे न जाने कब से छिपाकर रखी थी। वृद्धा ने कहा कि हर बार खाना खिलाकर चल जाथा, हमन कुछ नहीं दे पाथी बेटी। यह कहते हुए भावुक होकर वह भिक्षाटन में मिले कुम्हड़ा का फल उनकी ओर बढ़ा दी। वृद्ध महिला ने जिस भाव के साथ अपने कंपकंपाते हाथों से कुम्हड़ा भेंट किया, इसे देखकर सभी ने भेंट स्वीकार किया, इसके साथ ही उसका नाम कुम्हड़ा वाली दाई रख दिया।
इन महिलाओं का मिल रहा सहयोग
वर्तमान में वन्दना दत्ता के साथ रात्रिकालीन भोजन सेवा के शुरूआती दौर मेें सहयोगी रहीं रेखा इंगोले के अलावा संगीता-अखिलेश सोनी, डॉ. आराधना अयंगर, श्रद्धाखेर पांडे, आशा बसंल, ज्योति द्विवेदी, नीलिमा गोयल, च्यती अग्रवाल, लिलि बसु राय, बबली, सीमा अग्रवाल, सरीफन निशा, सुनीता अग्रवाल, स्मिता तिवारी, हिना रिजवी, नसरीन, राधिका सिंह, वसुधा तिवारी सहित अन्य महिलाएं सक्रिय हैं।

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