दतिमा मोड़/सूरजपुर(अनुप जायसवाल)- अभी हाल ही में प्रकाशित प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 180 देशों में 142वे पायदान पर है, इस रिपोर्ट को हार साल संस्था द्वारा प्रकाशित किया जाता है, पिछले साल की तुलना में भारत का प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में स्तर गिरा है, भारत 2018 मे 140वे पायदान पर था और अब भारत 142वे स्थान पर है, हालांकि यह रिपोर्ट 2019 को ध्यान में रख कर बनाई गई है जिसे 2020 में प्रकाशित किया गया है। कुछ पहलुओ पर भारत की स्तिथि प्रेस में जरूर सुधरी है जैसे कि 2018 में भारत मे 6 पत्रकारों की मौते हुई थी, लेकिन 2019 में यह अंक शून्य पर आ गया है।

लेकिन इसके बावजूद भी कई ऐसे स्वरूप है जो प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में एक चिंता का विषय है। इकनोमिक टाइम्स के रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारो ने अपनी अभिव्यक्ति के कारण पुलिस की हिंसा झेली है, राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भी पत्रकारों को निशाना बनाया है और साथ ही साथ स्थानीय अधिकारियों एवं आपराधिक समूहों द्वारा भी पत्रकारों की आवाज़ों को दबाया गया है। इसके अलावा, कुछ पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक समन्वित घृणा अभियान चलाया गया, और खास कर यह घृणा उन पत्रकारों के लिए चलाया गया जो असंतोष के विषयों पर बात करते है, अभिव्यक्ति का हनन सिर्फ सोशल मीडिया या टेलीविज़न पर ही सीमित नही है यह विरोध अखबार के खबरों में भी देखा गया, ग्राउंड रिपोर्टिंग के बाद उस पर लिखे गए लेखों को भी अखबारों में प्रकाशित नही होने दिया गया, उन लेखों को सिर्फ ऑनलाइन सत्यपित किया गया।

क्या इन अंको से हम ये समझे कि भारत मे, आलोचना और न्यूट्रल रिपोर्टिंग बंद हो रही है या फिर भारत मे की जाने वाली रिपोर्टिंग अब क्या सिर्फ प्रोपेगंडा आधारित रिपोर्टिंग है। भारत का प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में स्तर 2011 से ही खराब रहा है हालांकि 2016 यह स्थान 133वे पायदान पर आ गया था, पर फिर 2016 के बाद क्यू भारत का प्रेस की स्वतंत्रता में अंक नीचे गिरता चला जा रहा है, क्या भारत की मीडिया ने सत्ता से सवाल करना छोड़ दिया है और क्या विपक्ष से सवाल करने में भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपना ध्यान ज्यादा केंद्रित किया हुआ है या फिर भारत की मीडिया का सिर्फ वाणिज्यीकरण की तरफ ज्यादा ध्यान है इन सभी सवालों का जवाब आपको आसानी से मिल जाएगा, बस आपको ये देखना है कि भारत की मीडिया कितने ऐसे खबरों को प्रकाशित करती है जो ग्रामीण भारत की समस्याओं से जुड़ी हो और दुख की बात यह है कि मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा ग्रामीण भारत के खबरों को प्रकाशित करने का प्रतिशत सिर्फ और सिर्फ 0.98 है।

मेनस्ट्रीम मीडिया किस तरह से काम कर रही है यह बताने की जरूरत भी नही है क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया की तरफ से ही भारत को यह बताने की कोशिश की गई थी कि 2000 रुपए के नए नोट में एक चिप लगा हुआ है पर बाद में यह खबर झूठी निकली और इस तरह के झूठे खबरों को चलाने का सिलसिला उसी वक़्त से शुरू हो चुका था जो आज अपने पैर चादर से बाहर निकाल कर आराम से ठंड को चुनौती दे रहा है। प्रोपेगंडा आधारित पत्रकारिता की वजह से भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया ने कभी इस पर चर्चा ही नही की, की वैश्विक भूख सूचकांक ( यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स ) जैसी सूचियों में भारत 102वे स्थान पर क्यू है। 2019 में सिटीजन जॉर्नलिस्म करने वाले पत्रकारों को भी कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, मिर्ज़ापुर के एक स्कूल में जब वहा के स्थानीय पत्रकार पवन जैसवाल ने मिड-डे मील में दी जा रही नून रोटी का खुलासा किया था जिसके तुरंत बाद ही उन पर FIR कर दिया गया और यह कहा गया कि पवन जैसवाल द्वारा राज्य सरकार की छवि को खराब करने की पहल की जा रही है। यह घटनाक्रम क्या हमें सोचने पर मजबूर नही करता है कि भारत मे पत्रकारों को सच कहने की क्या कीमत चुकानी पड़ती है। स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा किये गये कामो को जब आप इंटरनेट पर खोजेंगे तो उसके कमेंट बॉक्स में लोगो का असंतोष गलियों के रूप में साफ दिख जाएगा, पत्रकारों को धमकी, उनके परिवारों के साथ दुष्कर्म करने की धमकी ये मानो एक आम बात हो गई हो। अगर हम मेनस्ट्रीम मीडिया की बात करे तो उन्होंने असल मुद्दों पर न तो ज्यादा चर्चाएं की और न ही उन मुद्दों पर कोई कार्यक्रम का आयोजन किया, 2019 में मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा, शिक्षा, पर्यावरण, कुपोषण इन सभी मुद्दों को उपेक्षा में रखा गया। इन मुद्दों को प्रमाद करने के पीछे का क्या कारण है इस पर एक बहुत बड़ा सवाल उठना चाहिए, पर यहाँ सवाल ये है कि इन पर सवाल उठायेगा कौन क्योकि आज भारत मे सवाल पूछने वालो को राष्ट्रविरोधी का दर्जा दिया जाता है। भारत के संविधान की धारा 19 जिसमे अभिव्यक्ति की आज़ादी है, क्या मिड-डे मील में हो रही त्रुटियो को दिखाना अपराध है, क्या पानी, बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा एवं शशक्तिकरण इन सब पर रिपोर्टिंग करना अपराध है, अगर इसी तरह से ज़मीनी स्तर पर पत्रकारों की आवाज़ों को दबाया जाएगा , तो क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता रहेगी क्योकि लोकतंत्र के संचालन के लिए पत्रकारिता का निराधार होना बेहद ज़रूरी है, क्योकि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है और इस स्तंभ का निर्बाध होना बहुत अहम होता है क्योंकि पत्रकारिता ही वो एक मात्र जरिया है जिससे देश की आवाम अपनी बात हुकूमत तक पहुँचा सकती है।

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