मनेंद्रगढ़ । पतियों को साथ में बैठने की अनुमति नहीं मिलने पर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों ने जनपद पंचायत मनेन्द्रगढ़ की सामान्य सभा की बैठक का बहिष्कार कर दिया ।

बैठक में महिला जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने पतियों को बैठक में बैठाने की मांग को लेकर उत्पन्न विवाद ने पूरी सभा को प्रभावित किया और अंततः बैठक की बहिष्कार की स्थिति उत्पन्न हो गई और महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर चर्चा अधूरी रह गई। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जनपद पंचायत मनेंद्रगढ़ की सामान्य सभा की बैठक आयोजित की गई । बैठक प्रारंभ होने से पूर्व महिला जनपद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अन्य महिला जनपद सदस्यों ने अपने पतियों के साथ बैठक में भाग लेने की अनुमति मांगी। जब अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से नियमों का हवाला देते हुए इस मांग को अस्वीकार किया, तो नाराज़ महिला जनप्रतिनिधियों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया जिससे बैठक में प्रस्तावित कई महत्वपूर्ण विकास योजनाओं पर चर्चा अधूरी रह गई। जानकारों के अनुसार भारत में पंचायती राज प्रणाली व्यवस्था के अंतर्गत महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान इस मंशा से किया गया था कि वे ग्राम शासन में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने वाली सशक्त भागीदार बन सकें। लेकिन जब निर्वाचित महिलाएं खुद की बजाय अपने पतियों को प्रतिनिधित्व देने की शर्त रखने लगें, तो यह सीधे तौर पर लोकतंत्र और महिला सशक्तिकरण की भावना पर चोट है। यह प्रवृत्ति “सरपंच पति”, “जनपद पति” जैसी असंवैधानिक संस्कृति को बढ़ावा देती है, जो ग्रामीण शासन की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को प्रभावित करती है । इस प्रकरण पर जिला पंचायत मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर की मुख्य कार्यपालन अधिकारी का कहना है कि बैठक नियत समय पर प्रारंभ हुई थी। महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने पतियों को शामिल करने की अनुमति मांगी, जो नियमविरुद्ध होने के कारण जनपद पंचायत सीईओ ने अस्वीकार कर दी। यह मांग न तो व्यवहारिक थी, न ही वैधानिक।”उन्होंने स्पष्ट किया कि चुने गए जनप्रतिनिधियों को ही निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। किसी अन्य को उस भूमिका में शामिल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध है।
जानकारों का कहना है कि यह घटनाक्रम केवल एक सभा का बायकॉट नहीं, बल्कि यह पूरे पंचायत तंत्र को आइना दिखाने वाला है। जब महिलाओं को आरक्षण के माध्यम से अधिकार मिले हैं, तो उन्हें उनका जिम्मेदार उपयोग करना भी सीखना होगा। महिला नेतृत्व की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब निर्णय वे स्वयं लेंगी, न कि परोक्ष रूप से उनके पति या परिजन। महिला सशक्तिकरण को दिखावे से निकालकर हकीकत में लाने की जरूरत है। पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण के उद्देश्य को समझने और उसे सही दिशा देने की है। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों का नियमित प्रशिक्षण आयोजित किया जाए। संविधान, पंचायती राज अधिनियम और निर्णय प्रक्रिया की समझ को मजबूत किया जाए। “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियों को सख्ती से रोका जाए। यह केवल एक बैठक की बात नहीं – यह सवाल है लोकतंत्र में महिलाओं के असली नेतृत्व की।
जब तक वे स्वयं निर्णय की कुर्सी पर नहीं बैठेंगी, तब तक प्रतिनिधित्व अधूरा ही रहेगा। आरक्षण का उद्देश्य “सशक्तिकरण”, न कि “परदे के पीछे का संचालन” है ।
महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण इस उद्देश्य से दिया गया था कि वे स्वयं निर्णय लें, नेतृत्व करें और निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनें। यदि महिलाएं सिर्फ नाम मात्र की प्रतिनिधि बनें और उनके स्थान पर उनके पति या पुत्र निर्णय लें, तो यह आरक्षण की मूल भावना के साथ धोखा है। ‘सरपंच पति संस्कृति’ लोकतंत्र को खोखला करती है । जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि खुद नहीं, बल्कि उनके “पति” पंचायत की बैठकों में भाग लेने की मांग करें, तो यह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह महिला नेतृत्व को भी कमजोर करता है। इससे पंचायत का आत्मनिर्भर और जवाबदेह तंत्र बाधित होता है। सीईओ द्वारा नियमों का पालन कर पतियों को बैठक में बैठाने से मना करना एक दृढ़ और सही प्रशासनिक निर्णय था। लेकिन यह भी ज़रूरी है कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों को संविधान, पंचायत नियमों और उनके दायित्वों की पूरी जानकारी दी जाए ताकि वे आत्मनिर्भर निर्णय ले सकें। यह घटना यह भी दर्शाती है कि अभी भी समाज में कई जगहों पर महिलाओं को निर्णयकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, और स्वयं महिलाएं भी अपनी भूमिका को सही से नहीं समझ पाई हैं। इस सोच में परिवर्तन लाना होगा। निर्वाचित होना केवल अधिकार नहीं, एक कर्तव्य और जिम्मेदारी भी है। जो महिलाएं चुनाव लड़कर जनप्रतिनिधि बनी हैं, उन्हें विकास योजनाओं, पंचायत बैठकों और निर्णयों में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। आरक्षण से सिर्फ कुर्सी मिलती है, प्रतिष्ठा और प्रभाव तो सक्रिय भागीदारी से बनते हैं। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब हर जनप्रतिनिधि महिला हो या पुरुष अपनी भूमिका को समझे और निभाए।

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