*प्यासा कुएं के पास जाता है, कहावत को भीषण गर्मी के बीच झुठला रहा मेडिकल कॉलेज अस्पताल*
गिरजा ठाकुर
अंबिकापुर। प्यासा कुएं के पास जाता है… इस कहावत को भीषण गर्मी के बीच झुठला रहा है, राजमाता श्रीमती देवेंद्र कुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध जिला अस्पताल परिसर में स्थित अंधकूप! जी हां…गर्मी के मौसम में शहर ही नहीं संभाग के सबसे बड़े इस अस्पताल में पानी के लिए हा-हाकार की स्थिति बन गई है। अस्पताल की सफाई व्यवस्था को बनाए रखने स्वच्छकों को पानी जुटाने संघर्ष करना पड़ रहा है। भर्ती मरीजों की क्या हालत होगी, यह बताने की जरूरत नहीं है। ऐसे हालातों से उबारने के लिए सार्थक प्रयास करने के बजाए अस्पताल प्रबंधन इसका ठीकरा उन कर्मचारियों पर फोड़ रहा है, जो अल्प वेतन में यहां आने-जाने वाले मरीजों की सुख-सुविधा बनाए रखने के लिए ताकत झोंकते नजर आते हैं। यही नहीं अस्पताल परिसर के सूखे अंधकूप की प्यास बुझाने निगम के टैंकर से पानी डलवाने की खानापूर्ति की जा रही है, जबकि धरातल तक सूख चुके इस अंधकूप में पानी डालना अक्ल के पीछे लट्ठ लेकर भागने जैसा है। देखा जाए तो मौसम परिवर्तन के बीच गर्मी का काफी समय टल चुका है। 10 दिन के अंतराल में नवतपा का प्रारंभ होगा। इसके पहले संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में जो हालात देखने को मिल रहे हैं, वे काफी पीड़ादायक हैं। पानी की कमी का दौर आज से नहीं चल रहा है। अस्पताल के कई हिस्से में जल संकट की स्थिति मई माह के प्रथम सप्ताह से ही बन रही है। ऐसे में हर वार्ड तक पानी को कर्मचारियों के भरोसे पहुंचा पाना आसान नहीं है। इधर प्रबंधन अस्पताल के वार्डों तक पानी की कमी सामने आने पर इसका पनिशमेंट  कर्मचारियों को जिम्मेदार मानते हुए देने में लगा है, जैसे पानी की उन्होंने कृत्रिम किल्लत बनाकर रखी हो। पानी की कमी दूर करने अंधकूप को टैंकर से भरने ताकत झोंकी जा रही है। देखा जाए तो मुख्य अस्पताल परिसर के सामने स्थित मातृ एवं शिशु अस्पताल परिसर में एक पानी टंकी बना है, जिसमें निगम की ओर से पानी भरा जाता है। सूत्र बताते हैं कि इस टंकी के पानी का उपयोग अस्पताल में नहीं बल्कि एमसीएच परिसर से लगी कुछ दुकानों के दुकानदार करते हैं। इन हालातों ने न सिर्फ स्वच्छकों को पशोपेश में डाल दिया है, बल्कि भीषण गर्मी में वे पानी ढोते फिर रहे हैं।
*पानी की कमी से हालात बदतर*
अस्पताल में पानी आपूर्ति की बनी कमी की वजह से शौचालयों की स्थिति बदतर है। यहां की सफाई के लिए न सिर्फ स्वच्छकों को ताकत झोंकना पड़ रहा है, बल्कि वे चिलचिलाती गर्मी के बीच नाक-मुंह बंद किए मन-मसोस कर स्वच्छता बरकरार रखने की कोशिश में लगे हैं। करोडों की लागत से बने एमसीएच के हालात वैसे भी किसी से छिपे नहीं है। अव्यवस्थाओं को दूर करने ताकत झोंकने के बाद भी सीवर सीपेज व गंदगी थमने का नाम नहीं ले रही है।
*पनिशमेंट ने स्वच्छकों को किया हताश*
*फोटो- डीसी में बड़े हेडिंग के साथ लेंगे*
अस्पताल में स्वच्छता के लिए दिन-रात हाथ-पैर मारने वाले स्वच्छकों को सफाई व्यवस्था में कमी का खामियाजा पनिशमेंट बतौर भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल प्रबंधन की दो टूक नसीहत है, पानी चाहे हैंडपंप से लाओ या रानी तालाब से, हमें स्वच्छता चाहिए। इन हालातों की खबर रेडक्रॉस के अध्यक्ष आदित्येश्वर शरण सिंहदेव को भी मिली है। अस्पताल प्रबंधन से उन्होंने चर्चा भी की, इसके बाद हालात का जायजा लेने प्रबंधन की टीम निकली। देखा जाए तो इनके द्वारा रोजाना यहां की व्यवस्था का जायजा लिया जाता है, फिर भी गर्मी के मौसम को देखते हुए प्रबंधन चाहता तो पानी की किल्लत ना हो, इसके लिए अतिरिक्त पहल कर सकता था। ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती थी, जिससे पानी के लिए हा-हाकार जैसी स्थिति निर्मित नहीं होती।
*प्रबंधन से टूटी आस, जाएंगे कलेक्टर के पास*
अस्पताल प्रबंधन से आस टूटने के बाद स्वच्छक अब कलेक्टर के पास दुखड़ा सुनाने की तैयारी में हैं। मंगलवार को कलेक्टर के जनचौपाल में इनके पहुंचने की प्रबल उम्मीद बनी हुई है। स्वच्छकों का कहना है कि पानी की कमी होगी तो बाहर से पानी ढोकर कितने वार्डो की सफाई वे कर पाएंगे। वहीं कर्मचारियों की कमी के बीच उनके साथियों को 15 दिन के निलंबन का पनिशमेंट अस्पताल प्रबंधन किस आधार पर दे रहा है। कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं कि स्वच्छक कभी भी बड़ा कदम उठाने के लिए विवश हो सकते हैं।

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