निजी अस्पतालों, क्लीनिकों और पैथोलैब की भरमार, मानकों में कुछ ही खरा उतर रहे

अंबिकापुर। सरगुजा जिला में निजी अस्पतालों के अलावा क्लीनिकों और पैथोलैब की भरमार है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ा इक्का-दुक्का क्लीनिक, अस्पताल, लैब होगा, जो मानकों के तहत संचालित हो रहा हो। कई क्लीनिक टेंपररी लाइसेंस पर संचालित हो रहे हैं। मानक की बात करें तो इसमें शासन के द्वारा करोड़ों रुपये फंूकने के बाद शासकीय अस्पताल भी खरा नहीं उतर पा रहे हैं। झोला झाप इलाज करने वालों का रिकार्ड तो स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों के पास भी उपलब्ध नहीं मिलेगा।

जानकारी के मुताबिक, सरगुजा जिले में 116 क्लीनिकों, 43 निजी अस्पतालों और 56 पैथोलैब का संचालन स्वास्थ्य अमले की जानकारी में हो रहा है। इनमें से शत-प्रतिशत निजी अस्पतालों के संचालन का लाइेंसस प्रदाय किया गया है। हालांकि इन अस्पतालों में कई नर्सिंग होम एक्ट के मानक में खरा नहीं उतर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े अन्य संस्थानों में क्लीनिकों की भरमार जिले में देखने को मिल जाएगी, इनमें से अधिकांश के पास स्थायी लाइसेंस नहीं मिलेगा। कुछ ने क्लीनिकों के लाइसेंस हेतु स्वास्थ्य विभाग में आवेदन दिया है। सात नए अस्पतालों के संचालन के लिए भी आवेदन पहुंचा है। नर्सिंग होम एक्ट के तहत स्वास्थ्य सेवा से जुड़े निजी संस्थानों का संचालन हो रहा है, या नहीं इसके लिए हर तीन माह में जांच का प्रावधान किया गया है। निजी अस्पतालों में मरीज के जांच और उपचार के लिए पर्याप्त, योग्य चिकित्सकों व नर्सों का होना जरूरी है। अधिकांश अस्पतालों में देखने को मिलता है कि गंभीर स्थिति में मरीज के पहुंचने पर प्रयोग की स्थिति बनती है। इन अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की लम्बी-चौड़ी सूची प्रदर्शित मिल जाएगी, इनमें कई चिकित्सक ऐसे रहते हैं, जो शासकीय अस्पतालों में सेवा दे रहे हैं, जबकि शासकीय सेवा देने वाले चिकित्सक निजी अस्पतालों में नहीं बैठ सकते। अपने क्लीनिक के पर्सनल चेम्बर में शासकीय अस्पतालों में सेवा देने के बाद एक निर्धारित समय तक वे जरूर मरीजों को देख सकते हैं। ऐसे कम ही शासकीय अस्पतालों के चिकित्सक मिलेंगे, जो चिकित्सकों के लिए बने गाइडलाइन का पालन कर रहे हों। जानकारों का कहना है कि शहर के नामचीन निजी अस्पतालों में डिस्प्ले किए जाने वाले शासकीय अस्पताल में सेवा देने वाले चिकित्सकों का नाम हटा दें तो कई अस्पताल चिकित्सक विहीन हो जाएंगे। हाल में नर्सिंग होम के नोडल अधिकारी ने बनारस रोड चठिरमा में संचालित एक स्वास्थ्य संस्थान को सील करने की कार्रवाई की थी। देखा जाए तो जिले में कई झोलाछाप चिकित्सक मिल जाएंगे, जिनके उपचार पर ग्रामीणों को कुछ अधिक ही भरोसा रहता है। इसके पीछे कारण, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में शासकीय स्वास्थ्य केन्द्रों में उपचार के लिए जाने पर चिकित्सकों का नहीं मिलना या फिर उन्हें अन्य अस्पतालों का रास्ता दिखाना रहता है।

आयुष्मान योजना हो गए मालामाल
सरकार की बीमारों के नि:शुल्क उपचार के लिए बनी आयुष्मान योजना ने निजी अस्पतालों के संचालकों को मालामाल कर दिया है। कई अस्पताल तो करोड़ों रुपये शासन की इस योजना से एकमुश्त प्राप्त कर रहे हैं, इसके बाद भी मरीजों व इनके स्वजनों की जेब हल्की हो रही है। गंभीर स्थिति में अगर मरीज पहुंच जाए, तो शहर के कुछ अस्पतालों में नाम बड़े-दर्शन छोटे जैसा कहावत चरितार्थ होते नजर आता है। आईसीयू में मरीज को भर्ती करने के बाद मोबाइल फोन पर विशेषज्ञ चिकित्सकों से सलाह लेकर उपचार करने जैसा परिदृश्य भी सामने आ चुका है। मानकों के विपरीत संचालित अस्पतालों पर नर्सिंग होम एक्ट के गाइडलाइन अनुरूप वैधानिक कार्रवाई नहीं होने से ऐसे हालात बन रहे हैं।

क्लीनिक के लिए भी गाइडलाइन
निजी क्लीनिकों के लिए भी गाइडलाइन निर्धारित किए गए हैं। क्लीनिकों में आपातकालीन दवाओं की उपलब्धता के साथ इलाज की समुचित सुविधाएं उपलब्ध रहनी चाहिए। क्लीनिक संचालक के बैठने और उपचार की सुविधा प्रदान करने के लिए पर्याप्त जगह की उपलब्धता रहनी चाहिए। किसी पीड़ित का तबियत ज्यादा खराब होने या रेफर करने जैसी स्थिति में हायर सेंटर या नजदीकी अस्पताल तक मरीज को छोड़ने की जिम्मेदारी भी संबंधित क्लीनिक संचालक की है। अधिकांश देखने को यह मिलता है कि मरीज जब तक धन से सक्षम रहता है, तब तक उसकी पूछ-परख निजी अस्पतालों या क्लीनिकों में ज्यादा होती है। धन से कमजोर होने पर उसे सरकारी अस्पताल का रास्ता दिखा दिया जाता है।

बयान
सरगुजा जिले में निजी अस्पतालों का संचालन नार्म्स के तहत हो, इसके लिए लगातार छापामार कार्रवाई पांच सदस्यीय टीम के साथ की जा रही है। कमियां सामने आने पर अस्पताल संचालकों को निर्धारित मानकों का पालन करने के निर्देश दिया जा रहा है।
डॉ. पी.के. सिन्हा, डीएचओ व नोडल नर्सिंग एक्ट 

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