मां की परेशानी देख कॉलेज की प्राइवेट पढ़ाई करने की ठानी, बेच रही स्वादिष्ट अचार
girija thakur 

अंबिकापुर। पति का साथ छूटने के बाद भी किरण हिम्मत नहीं हारी और इकलौती बेटी की परवरिश के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगी। मायके से कुछ आर्थिक सहयोग मिल जाता था, जिससे इनका गुजारा हो रहा था। बेटी जब कक्षा 12वीं उत्तीर्ण करके कॉलेज में दाखिला की ओर कदम बढ़ाई तो उच्च शिक्षा में आने वाले खर्च ने किरण को चिंतित कर दिया। मां की चिंता को बेटी ने भांपा और उसने कॉलेज की प्राइवेट पढ़ाई करने का निर्णय लिया, ताकि वह अपनी मां के काम में हाथ बंटा सके। हालातों से समझौता करके चल रही मां का सहारा बनी बेटी अब पिकल कॉलेज गर्ल बन गई है।

मां की तबियत खराब होने के कारण रूचिका स्वयं रोजाना अचार का पैक डब्बा लेकर शहर के घड़ी चौक में पहुंच जाती है और कभी 30-40 तो कभी 50 डिब्बे से अधिक अचार बेचकर घर लौटती है। इस दौरान उसे हर तरह के लोगों का सामना करना पड़ता है। कोई काफी देर तक अचार का मोल-भाव करके लौट जाता है, तो कोई अचार का स्वाद, महक लेने की जिजीविशा रखता है और बिना अचार लिए चले जाता है। यहां आम, नींबू, गाजर, मिर्च सहित अन्य फलों के अचार के साथ ही जामुन का अचार मिल जाएगा। रूचिका का कहना है कि घर-घर तक मां के हाथों से बने अचार का स्वाद लोग ले रहे हंै, घर में बने इस अचार का नाम प्रतापपुर चौक निवासी किरण गुप्ता ने अपनी बेटी रूचिका गुप्ता के नाम पर रूचि का स्वाद रखा है, जो वर्तमान में राजमोहिनी देवी शासकीय कन्या महाविद्यालय की बीए प्रथम वर्ष की प्राइवेट छात्रा है। अचार बनाने में मां का साथ देने के कारण रूचिका रोजाना कॉलेज की पढ़ाई कर पाने में अक्षम थी। आर्थिक दिक्कतों को दूर करने उसने मां के साथ घर में ही अचार बनाने में सहयोग करने की ठानी और शिक्षा की धारा से जुड़े रहते हुए जनवरी 2024 में 50 छोटे डिब्बों में अचार भरकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया। टेबल-कुर्सी के अभाव में आकाशवाणी चौक में किनारे फुटपाथ में अचार के डिब्बों को सजाकर किरण-रूचिका अचार बेचती थीं। बाद में शहर के हृदयस्थल घड़ी चौक में टेबल में अचार के डिब्बों को सजाकर रोजाना अपने कारोबार में रमी रूचिका नजर आती है।

रोजाना 60-70 डिब्बा अचार करते हैं तैयार
रूचिका बताती है कि पिता का साथ छूटने के बाद गांव में रहने वाले नाना उनका सहारा बने। वे महीने में पांच-छह हजार रुपये भेज देते थे, जिससे पढ़ाई सहित अन्य खर्च की पूर्ति होती थी। मां ट्यूशन पढ़ाकर कुछ कमा लेती थी। इसी बीच जशपुर जिले में रहने वाली मौसी ममता गुप्ता ने घर में ही कुछ बनाकर बाजार में बिक्री करने के लिए प्रेरित किया, इसके बाद किरण गुप्ता ने होम मेड अचार बनाकर डिब्बे में पैक करके बेचने का निर्णय लिया और अब मां-बेटी मिलकर रोजाना 60 से 70 डिब्बा अचार बनाकर बेचती हैं। आम-कटहल के मौसम में जहां एक ओर शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जहां अचार का भरपूर स्टॉक साल भर के लिए बनाकर न रखा गया हो। ऐसी परिस्थितियों के बीच पिकल कॉलेज गर्ल का ग्राहकों के इंतजार में धैर्य रखकर रोजाना पांच से छह घंटे शहर के हृदयस्थल, घड़ी चौक में बैठना वास्तव में ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्पद है, जो छोटी से परेशानी में स्वयं को हारा हुआ महसूस करने लगते हैं।

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