अंबिकापुर जिला मुख्यालय से 35किमी और ग्राम बड़ा दमाली मुख्य मार्ग से 13 किलोमीटर अंदर की ओर
बंदरकोट की गुफा स्थिति है। यद्यपि जिला मुख्यालय से इसकी दूरी अधिक नहीं है, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए आपको 5-7किलोमीटर दुस्तर और दुर्गम रास्तों की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
       बंदरकोट गुफा छोटा नागपुर  पठार के सुदूर दक्षिण भाग मैनपाट की
तराइयों में स्थित है, यहां की चट्टानें ग्रेनाइट व नीस (आग्नेय चट्टानों) से बनी हुई है,जो क्रिटेसियस (ज्वालामुखी युग) की है। इस ऐतिहासिकता के पीछे एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक मान्यता इसे बल प्रदान करती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि यह गुफा वानर राज सुग्रीव की गुफा है, लोकमत है कि अपने निर्वसन काल के दौरान सुग्रीव ने यहां कुछ काल तक निवास किया था,जब वे अपने अग्रज बालि के भय से इधर उधर भटक रहे थे।इस गुफा के अंदर दो अति संकरे मार्ग भी है जो परस्पर एक दूसरे की ओर निकलते हैं।इस गुफा ने युगों-युगों के इतिहास को अपने में समेटे हुए है।
       बंदरकोट (सुग्रीव की गुफा) स्थानीय लोटना नदी के शीर्षतट पर स्थित है।इस गुफा से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर हनुमान गद्दी, और एक जलकुंड स्थिति है, लोकमान्यता है कि उक्त स्थान से हनुमानजी पहरा दिया करते थे।
          ग्रामीणों की मान्यता को कई कारणों से बल मिलता है जो सहज ही
बंदरकोट गुफा की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हैं।
पहला कारण यह है कि,यह गुफा छत्तीसगढ़ में श्री राम वन गमन पथ के तट पर स्थिति है,दूसरा कारण इसके समीप और तराइयों में बसे गांवों के नामों से भी सिद्ध होती है।बंदरकोट गुफा से मैनपाट की ओर जाने पर “सरभंजा” ग्राम है,जो” सरभंज ऋषि”की तपोस्थली थी,सरभंज ऋषि
को श्री राम ने अपने वनवास काल के समय सीताजी और भ्राता लक्ष्मण सहित भेंट किया था,जिसका रामचरितमानस के अरण्य काण्ड में
उल्लेख किया गया है, “पुनि आए जहॅं मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा “।। क्या” सरभंग”का अपभ्रंश”सरभंजा” नहीं हो सकता ठीक उसी तरह जैसे यमुना नदी का संबोधन “जमुना” हो जाना?”युवक”
 
शब्द का संबोधन “जुवक” हो जाना
  ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही मान्यता को पुष्ट नहीं करता?
   बंदरकोट की गुफा से कुछ किलोमीटर दूरी पर मैनपाट की  “मतरिंगा”की पहाड़ियों से रेण (रेणुका)
नदी का भी उद्गम स्थल है। रेण नदी को सरगुजा परशुराम की माता “रेणुका”के रूप में देखता है,यह सिर्फ सरगुजा की सांस्कृतिक मान्यता ही नहीं, बल्कि हम भारतीय सभी नदियों को मातृ रूप में देखते हैं,गंगा,यमुना,नर्मदा कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसी नदियां इसके अप्रतिम उदाहरण है।     बाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस दोनों में”मतंग ऋषि ” का विवरण है, रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में वर्णित है। मायावी राक्षस का वध कर बालि ने उसके शव को कोसों दूर तक फेंकता है, जिससे उसके रक्त की बूंदें मतंग ऋषि के तपोस्थली में गिरती है,तब ऋषि ने क्रोधित हो शाप दिया कि जिसके द्वारा भी रक्त की बूंदें यहां गिरी है वह इस पर्वत पर आते ही मृत्यु को प्राप्त करेगा।
   रामचरितमानस में के किष्किन्धाकाण्ड में राम सुग्रीव मित्रता के पश्चात सुग्रीव अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “ताके भय रघुवीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेऊॅं बिहाला”।।६।।
       आगे इस पर्वत पर अपने को सुरक्षित रहने का कारण बताते हुए
सुग्रीव कहते हैं, “इहॉं शाप बस आवत नाहि।।तदपि सभीत  रहऊॅं मन माही”।।७।।(भावार्थ यह है कि बालि यहां मतंगऋषि के शाप को कारण नहीं आता फिर भी मैं यहां भी सदैव भयभीत रहता हूं।  बाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस में सुग्रीव की शरणस्थली ऋष्यमूक पर्वत को बताया गया है) बंदरकोट को सुग्रीव की गुफा सिद्ध करने की आंचलिक मान्यता को
अरण्य काण्ड में शबरी प्रसंग से जोड़ कर देखना आवश्यक है।भक्तिन शबरी श्री राम से कहती हैं, “पंपा सरहि जाहु रघुराई।तहॅं होइहि सुग्रीव मिताई”।।
( बंदरकोट से कुछ दूरी पर ग्रामपंचायत नानदमाली के पंपापुर गांव और उसके जलाशय से है)शबरी का तात्पर्य था प्रभु राम आप पंपापुर (बाली की राजधानी) और उसके जलाशय के पास जाएं और वहां सुग्रीव से मित्रता स्थापित करें।
        इसके अतिरिक्त एक अन्य साहित्यिक, पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को पुनर्स्थापित करता है , उदयपुर की पहाड़ियों में स्थित रामगढ़ की पहाड़ी। यहा स्थिति जोगीमारा गुफा को भगवान राम के वनवास काल के दौरान उनके निवास स्थान के रूप मान्यता प्राप्त, वनवास काल के दौरान भगवान राम के तापस (तपस्वी,जोगी, अकिंचन)भेष के कारण इस गुफा का नाम जोगीमारा गुफा पड़ा। जबकि सीताजी और लक्ष्मण जी के नाम पर सीताबेंगरा और लक्ष्मण गुफा भी है।
    रामगढ़ का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत श्री राम के वन गमन क्षेत्र, भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की रचना (ई०पू० २००) से पूर्व यहां मौजूद विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशाला (थियेटर) और महाकवि कालिदास की रचना मेघदूतम की सृजन स्थली होने के बाद समग्र मैनपाट का पठार जिसमें बंदरकोट गुफा भी शामिल हैं,आज अपने लिए यथायोग्य सम्मान से वंचित नहीं है?
        बंदरकोट के दुर्गम रास्ते में गणेश पत्थर भी है जिसकी आकृति गजमुख (हाथी के मुंह) की तरह है। इतिहास का छात्र होने के कारण एक बात का उल्लेख अवश्य करना चाहुंगा कि “सरगुजा के हाथी अखिल भारत के सार्वभौमिक सम्राट चंद्रगुप्त को भी प्रिय थे।
      क्या इतने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक  और भौगौलिक नामों के साक्ष्य के आधार पर जिनका वर्णन रामायण से लेकर रामचरितमानस में है,तब क्या बंदरकोट गुफा को सुग्रीव की गुफा मानना उचित नहीं होगा?
   एक ओर जहां अयोध्या में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा होना देश की सांस्कृतिक एकता द्योतक है,वही दूसरी ओर बंदरकोट और रामवन पथगमन,मार्ग की अपेक्षा राष्ट्र के प्रति सांस्कृतिक संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
      जबकि बंदरकोट को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के रूप में स्थापित करने से क्षेत्रीय संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा,वही दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण इस क्षेत्र में साधनों का अभ्युदय होगा,और क्षेत्रीय जनता के साथ साथ स्थानीय लोगों को भी रोजगार के साधन उपलब्ध होंगे।
        बंदर कोट गुफा हजारों वर्षों से लेकर आज तक अपने उत्थान के लिए
हनुमान जी की तरह राम को निहार रहा है। उपेक्षित बंदरकोट गुफा सांस्कृतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का स्वर्णिम त्रिभुज है, अतएव
समाज,शासन, और प्रशासन के सहयोग और सामंजस्य से उक्त स्थल को सांस्कृतिक श्रद्धा के केन्द्र के रूप में स्थापित किया जाना आवश्यक है।
         महाभारत में वेदव्यास (कृष्णद्वैपायन) ने कहा भी है,जो देश अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर नहीं रख पाता
उस देश का अदृश्य रूप से प्रतिपल क्षरण होता रहता है। इसलिए भारत की संस्कृति सुरक्षा हेतु बंदरकोट गुफा और वहां तक के पहुंच मार्ग का उन्नयन आवश्यक है।

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