अशफाक अली
वरिष्ठ पत्रकार, अंबिकापुर

अंबिकापुर। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने शनिवार को छत्तीसगढ़ में लोकसभा सीट के प्रत्याशी की घोषणा कर दी है। इसी क्रम में सरगुजा और कोरबा लोकसभा क्षेत्र पर नजर डालें तो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सरगुजा लोकसभा से कांग्रेस से दल-बदल कर आए सामरी के पूर्व विधायक चिंतामणि महाराज पर भाजपा ने दांव लगाया है। वहीं कोरबा लोकसभा सामान्य  सीट से पूर्व राज्यसभा सदस्य राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा की चर्चित महिला नेत्री सरोज पांडे को उतारा है। भाजपा के प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही कांग्रेस के प्रत्याशियों के भी कयास लगाये जा रहे हंै। अपने कार्यक्रमों में हमेशा पीछे चलने वाली कांग्रेस पार्टी अभी तक प्रत्याशियों की घोषणा नहीं कर पाई है। पता चला है कि चार या पांच मार्च को दिल्ली में चुनाव समिति की बैठक होने वाली है, इसके बाद ही कांग्रेस के प्रत्याशियों की घोषणा की जाएगी।

सरगुजा लोकसभा सीट का वर्तमान परिवेश में राजनीतिक रूप से विश्लेषण करने पर भाजपा के प्रत्याशी चिंतामणी महाराज, भाजपा के अन्य प्रत्याशियों की तुलना में सबसे कमजोर प्रत्याशी नजर आ रहे थे। बताया जाता है कि पैनल में उनके नाम का जिक्र तक नहीं हो रहा था। पूर्व सांसद कमलभान सिंह और पूर्व विधायक विजयनाथ सिंह आगे चल रहे थे, किंतु आखिरी के 12 घंटे में अचानक किसी वीटो पावर के तहत गहिला गुरु आश्रम के चिंतामणि महाराज का नाम फाइनल हो गया। सरगुजा की राजनीति में चिंतामणि महाराज का वजूद दो महत्वपूर्ण कारणों से है। पहला सरगुजा संभाग के सर्वाधिक लोकप्रिय आदिवासी संत गहिला गुरु के वे पुत्र हैं, जिनके आश्रम तथा अनुयायी सरगुजा संभाग के सभी क्षेत्र में पाए जाते हैं। दूसरा उनका आदिवासी समुदाय के कंवर जाति का होना है। इसके अलावा उनके पास न तो कोई अन्य विशेष आकर्षक व्यक्तित्व है  और न ही लोगों को लुभाने वाली जादुई कला है। वे शांत व सौम्य स्वभाव के मालिक हैं। प्रथम बार जब वे सामरी विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़े तो बुरी तरह हार गए थे। उन्हें राजनीति में स्थापित करने में सबसे बड़ा योगदान कांग्रेस के दिग्गज नेता सरगुजा महाराज, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का रहा है। इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है। सिंहदेव ने उन्हें कांग्रेस प्रवेश कराकर लुंड्रा विधानसभा से पहली बार चुनाव लड़वाया और विधायक बनने में मदद की। किंतु उनकी कार्यशैली और कार्य व्यवहार से लुंड्रा विधानसभा के लोग नाराज होकर उन्हें अगले चुनाव में हराने की कसम खा लिए थे। जब लुण्ड्रा  विधानसभा की सारी राजनितिक परिस्थितियां चिंतामणि महाराज के प्रतिकूल दिखाई देने लगी तो टीएस सिंहदेव ने उन्हें विधानसभा चुनाव 2018 में लुण्ड्रा से हटाना ही बेहतर विकल्प समझा, किंतु गहिला गुरु आश्रम से जुड़े अनुयायियों के अलावा अन्य कंवर समाज के वोटों को कांग्रेस के पक्ष में करने के उद्देश्य से चिंतामणि महाराज को आश्चर्जनक ढंग से सामरी विधानसभा सीट की टिकट दिलवा दी और अपने कुशल राजनीतिक कौशल और प्रभाव का उपयोग करके फिर से उन्हें विधायक बनवा दिया। विधायक बनने के बाद इनकी कार्य शैली और कार्य व्यवहार में बिल्कुल परिवर्तन नहीं आया। वे कांग्रेस संगठन को पूरी तरह छोड़कर स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर दिए। जिन्होंने उन्हें विधायक बनाया था उन लोगों की वह बुरी तरह उपेक्षा करने लगे। फलस्वरुप पूरे सामरी विधानसभा क्षेत्र में उनके खिलाफ असंतोष तथा आक्रोश की लहर फैल गई। सिंहदेव ने उनके व्यवहार को बदलने की कई बार सलाह दी और समझाया कि कांग्रेस संगठन के लोगों और क्षेत्र की जनता को अपने साथ लेकर चलिए, परंतु चंद लोगों के चंगुल में फंसकर अपनी कार्यशैली में परिवर्तन लाने में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। वे लगातार जिला कांग्रेस कमेटी बलरामपुर और कांग्रेस के अन्य  पदाधिकारी की उपेक्षा करते रहे। इसी बीच संसदीय सचिव बनने के चक्कर में उन्होंने भूपेश बघेल का दामन थाम लिया और टीएस सिंहदेव से लंबी दूरी बना ली। कई अवसर पर उनका विरोध करते हुए दिखाई दिए। सन 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी पराजय निश्चित नजर आने लगी। सिंहदेव ने सामरी विधानसभा की सारी परिस्थितियों से कांग्रेस हाईकमान को अवगत कराया। फलस्वरुप उनकी टिकट काटकर वहां से एक नए प्रत्याशी विजय पैकरा को टिकट दे दी गई। इस बात से नाराज होकर चिंतामणि महाराज ने कांग्रेस पार्टी से बगावत कर दी और भाजपा नेताओं को अपने घर श्रीकोट आश्रम कुसमी में आमंत्रित कर लिया। भाजपा के बड़े नेताओं के सामने उन्होंने यह शर्त रखी कि आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में सरगुजा सीट से उन्हें प्रत्याशी बनाने का आश्वासन दिया जाए तो वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाएंगे और पूरे संभाग में चुनाव प्रचार करके भाजपा को जिताने में मदद करेंगे। भाजपा के नेताओं से आश्वासन मिलने पर उन्होंने पार्टी ज्वाइन करके विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशियों के लिए सभी विधानसभा में घूम-घूम कर प्रचार किया। अंतत: सरगुजा की 14 सीटों में भाजपा को जो विजय प्राप्त हुई, इसमें उनके योगदान को भी रेखांकित किया गया। उनकी लोकसभा की टिकट पक्की मानी जा रही थी किंतु कांग्रेस कार्यकाल में हुए एक घोटाले की जांच में उनका नाम आने पर इनकी दावेदारी कमजोर नजर आने लगी। परंतु आदिवासी संत समाज और कंवर जाति के वोटों को आकर्षित करने के लिए अंतत: चिंतामणि महाराज को भाजपा ने अपना प्रत्याशी बना दिया। विधानसभा वार विश्लेषण करने पर देखा जाए तो भाजपा के प्रत्याशी चिंतामणि महाराज के सामने कांग्रेस की संभावित प्रत्याशी, युवा, ऊर्जावान शशि सिंह भारी दिखाई दे रही हैं। यदि कांग्रेस पार्टी आपस में तालमेल बनाकर मजबूती के साथ चुनाव लड़ती हैं तो सरगुजा लोकसभा सीट में कांग्रेस प्रत्याशी को विजय दिलाई जा सकती है, अन्यथा भाजपा के भारी सुविधा, संसाधन, कसा हुआ व्यवस्थित संगठन तथा कुशल कार्ययोजना के आगे कांग्रेस की युवा प्रत्याशी असहाय, साधन विहीन, लाचार तथा अबला नारी बनकर मजबूरी में ‘बेचारीÓ घोषित हो जाएगी।

गोंड़ जाति के करीब 6.50 लाख मतदाता
सरगुजा लोकसभा सीट का इतिहास देखने पर पता चलता है कि यहां से प्राय: आदिवासी समुदाय के गोड़ और कंवर जाति के नेता ही सांसद बनते आए हैं। जहां तक जातिगत जनसंख्या की गणना करने पर सरगुजा लोकसभा की आठ विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी समुदाय के गोड़ जाति के करीब 6.50 लाख मतदाता हंै। इसके बाद उरांव जाति के करीब 4.50 लाख तथा कंवर जाति के करीब चार लाख मतदाता हंै। इस प्रकार जाति के आधार पर देखें तो निश्चित रूप से गोड़ जाति का प्रत्याशी भारी पड़ेगा। भाजपा से कंवर जाति के प्रत्याशी चिंतामणि महाराज के सामने यदि कांग्रेस पार्टी गोंड़ जाति के प्रत्याशी को खड़ा करती है तो वह चुनावी अभियान में पहली बढ़त बनाने में सफल हो जाएगी।

जिपं सदस्य शशि सिंह दे सकती हैं टक्कर
आदिवासी गोंड़ जाति के प्रत्याशियों में सबसे चर्चित नाम पूर्व मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम तथा युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव तथा पूर्व मंत्री स्व. तुलेश्वर सिंह की पुत्री शशि सिंह का नाम चल रहा है, जो कि वर्तमान में प्रेमनगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत जिला पंचायत सदस्य हैं। डॉ. प्रेमसाय सिंह टिकट पाने के लिए उतनी रूचि नहीं दिखा रहे हंै क्योंकि उन्हें अपनी जीत सशंकित नजर आ रही है, किन्तु  टिकट पाने के लालसा में शशि सिंह ने काफी मशक्कत की है और रायपुर से दिल्ली तक जोर लगा दिया है। विदित हो कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक की 4200 किलोमीटर की भारत जोड़ो पदयात्रा में शशि सिंह, कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ सहभागी पदयात्री थीं, तब से वे लगातार राष्ट्रीय राजनीति में दिल्ली के संपर्क में बनी हुई हंै। इसका लाभ उन्हें मिल सकता है। विनिंग कैंडिडेट के रूप में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव के द्वारा भी उनके नाम पर सहमति जताने की खबर है। सिंहदेव के मार्गदर्शन, कुशल चुनाव संचालन तथा कांग्रेस के सभी समूहों के सहयोग से वे चुनाव लड़ती हैं तो उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भाजपा के प्रत्याशी चिंतामणि महाराज के खिलाफ कई विधानसभा क्षेत्रों में बहुत ज्यादा आक्रोश है।

यहां से मिल सकती है कांग्रेस को लीड
लुण्ड्रा और सामरी विधानसभा क्षेत्र के लोगों ने चिंतामणि महराज के 5-5 साल के कार्यकाल को बहुत अच्छे से अनुभव किया है। दोनों विधानसभा क्षेत्र में उनके खिलाफ पहले से ही माहौल बना हुआ है। इन क्षेत्रों से आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को लीड मिलना थोड़ा मुश्किल है। सीतापुर विधानसभा क्षेत्र परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रहा है, पिछले लोकसभा चुनाव में भी यहां से 20 हजार से ज्यादा की लीड कांग्रेस को प्राप्त हुई थी। इसलिए इस बार भी हालात वैसे ही रहने की संभावना है। गोंड़ जाति बाहुल्य प्रेमनगर व सूरजपुर विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस की संभावित प्रत्याशी शशि सिंह का गृह ग्राम व इनके परिवार के लोगों की राजनीतिक विरासत वाला क्षेत्र है। यहां पर कई दशकों से शशि सिंह के नाते-रिश्तेदार राजनीति करते आ रहे हैं, ऐसे में स्वाभाविक तौर पर उन्हें सूरजपुर विधानसभा क्षेत्र से लीड प्राप्त होने की संभावना है। इसका कुछ असर बगल की विधानसभा सीट भटगांव पर भी पड़ता नजर आ रहा है, पिछले दिन हुए एक सर्वे में यह बात नजर आई थी। प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र पूर्व मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम का कर्म क्षेत्र है, यहां भी गोंड़ जाति के लोग भारी संख्या में रहते हैं। डॉ. टेकाम कड़ी मेहनत करें और अच्छे से चुनाव संचालन करें तो यहां से भी कांग्रेस को लीड मिल सकती है।

मोदी लहर में प्रत्याशी की जीत मान रहे आसान
भाजपा के प्रत्याशी चिंतामणि महाराज केवल शहरी क्षेत्र अंबिकापुर सामान्य सीट और रामानुजगंज विधानसभा क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। रामानुजगंज विधानसभा के कद्दावर नेता वर्तमान मंत्री रामविचार नेताम के प्रभाव में निश्चित रूप से वहां से भाजपा के प्रत्याशी को लीड प्राप्त हो सकती है। इसके अलावा भाजपा मातृ वंदन योजना और धान बोनस प्रसाद से लाभान्वित होने वाले हितग्राहियों को आशा की नजर से देख रहे हैं। भाजपा का यह मानना भी है कि कथित मोदी लहर में कोई भी प्रत्याशी आसानी से जीत को प्राप्त कर लेगा। निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है किंतु इसका अहसास तो चुनाव परिणाम के बाद ही नजर आएगा कि वर्तमान में मोदी लहर है या नहीं? आठों विधानसभा क्षेत्र की गणना करने पर सरगुजा लोकसभा सीट में इस बार चिंतामणि महाराज का भाजपा प्रत्याशी होने के कारण कांग्रेस अपनी जीत की संभावना को आराम से टटोल सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में सरकार खोने के बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं तथा कार्यकर्ताओं तक में हताशा, निराशा का जो माहौल है वह अभी खत्म नहीं हुआ है। उनकी आगामी लोकसभा चुनाव में रुचि बिल्कुल ही दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस के बड़े नेता भी चुनाव न लड़ने की अखबारों में बयानबाजी करके कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित और निराश कर रहे हैं।

विस चुनाव में कांग्रेस के पराजय का कारण यह भी
पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस कमेटी किस चिड़िया का नाम है यह कार्यकर्ताओं को एहसास ही नहीं हुआ। प्रत्याशियों को टिकट देकर प्रदेश के संगठन ने चुनाव से पूरी तरह कन्नी काट लिया था। उन्हें इस बात की चिंता बिल्कुल नहीं थी कि उनका प्रत्याशी किन परेशानियों, विद्रोह, बगावत तथा भीतरघात को झेल रहा है। कुल मिलाकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने पूरे चुनाव से पल्ला ही झाड़ लिया था। ना तो प्रचार सामग्री का ठिकाना था, ना ही स्थानीय स्तर पर संगठन के लोग काम कर रहे हैं या नहीं उसका कोई सुपरविजन करने प्रदेश संगठन के पदाधिकारी मौजूद थे। प्रत्याशी को टिकट देकर अकेले संघर्ष करने के लिए मैदान में छोड़ दिया गया था। इसका परिणाम प्रतिकूल तो आना ही था और वैसा ही हुआ। जबकि भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई के पदाधिकारी तथा संगठन के लोग स्थानीय स्तर पर भाजपा के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क बनाए हुए थे, इसी का परिणाम है मातृवंदना योजना के लाखों फॉर्म रातों-रात  महिलाओं के भरवा दिए गए, इसका असर चुनाव परिणाम पर पड़ा और कांग्रेस को पराजय झेलने में ये भी एक कारण बना।

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