पारिवारिक कारणों से नहीं पहुंचे थे आयोजन पाए, 17 वर्ष हो गए अन्य किसी माध्यम से नहीं मिल पाया सम्मान  

अंबिकापुर। सरगुजा में भित्ती चित्रकला की जनक लखनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पुहपुटरा की स्व. सोनाबाई की कला को सुखरी के राधेश्याम ने आज भी जीवंत रखा है। भित्ती चित्रकला की मांग भले ही शहर में कम है, लेकिन इसी कला की बदौलत वर्ष 2007 में चिरनिद्रा में लीन हुई सोनाबाई वर्ष 1983 में राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित हुई थी। राधेश्याम इस कला के माध्यम से सरगुजा की धरा पर भले ही अपनी कोई खास पहचान नहीं बना पाए लेकिन वे इसे अपने परिवार की जीविका का आधार मानते हैं। इन्हें भी वर्ष 2007 में पूर्व राष्ट्रपति स्व. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों सम्मानित होना था, लेकिन पारिवारिक कारणों से वे इस मौके पर नहीं पहुंच सके। हैरत की बात यह है कि 17 वर्ष हो गए, इन्हें किसी अन्य माध्यम से सम्मान नहीं मिल पाया।  

बता दें कि सार्वजनिक स्थानों, शासकीय संस्थानों की बाउंड्री में उकेरे गए भित्ती चित्र बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। आधुनिकता की होड़ में भले ही आलीशान मकानों की साज-सज्जा में लोग लाखों खर्च करें, लेकिन भित्ति चित्र का आकर्षण कुछ अलग ही नजर आता है। भित्ति चित्र के माध्यम से कलाकार ग्रामीण व शहरी परिवेश की पुरातन संस्कृतियों को भी सामने लाने का प्रयास करते हैं। सुखरी ग्राम के राधेश्याम बताते हैं कि भित्ती चित्रकला को उन्होंने स्व. सोनाबाई से सीखा था। भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तक अपने कला की छाप छोड़ने वाली स्व. सोनाबाई अपने जीवितकाल तक पहचान की मोहताज नहीं रहीं। स्व. सोनाबाई की कला के बाद सुर्खियों में आए गांव पुहपुटरा तक इनके भित्ति चित्रकला को देखने एक समय अधिकारी, नेता सभी का पहुंचना होता था। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सोनाबाई जब भित्ति चित्र को अपने हाथों से उकेरती तो लोग बरबस ही देखते रह जाते थे। इसी चित्रकला के कारण उनके नाम और सरगुजा की चर्चा देश-विदेश तक होने लगी। स्व. सोनाबाई की इस कला को बरकरार रखे राधेश्याम कहते हैं कि हम अपने घर और शहर की दीवारों को कितने भी महंगे पेंट से रंगीन कर दें, तैलीय चित्रों से परिपूर्ण कर दें, लेकिन भित्ति चित्र का आकर्षण अकल्पनीय है। इसका रंगीन नजारा शहर के सार्वजनिक स्थलों पर भी देखने को मिल जाएगा।

कई शहरों में कराया अपनी कला से साक्षात्कार
राधेश्याम राजवाड़े बताते हैं कि वे प्रदेश के कई जिलों के साथ ही दूसरे राज्यों में भी भित्ती चित्र उकेर चुके हैं। दिल्ली, नागालैंड, कोलकाता, पंजाब, मोहाली के अलावा कई बड़े शहरों में अपनी कला से लोगों को साक्षात्कार उन्होंने कराया है। भित्ती चित्र को पसंद करने वाले अपने-अपने प्रदेश की संस्कृति व परंपराओं को घरों की दीवारों में उकेरने के लिए उन्हें आमंत्रित करते थे। इससे उनकी थोड़ी-बहुत आय भी हो जाती थी। उन्होंने बताया कि नारियल की रस्सी, रंग, मिट्टी, कपड़ा आदि से वे भित्ति चित्र को उकेरते हैं। इस कलाकृति की बदौलत उन्हें राज्य स्तर पर कई प्रमाणपत्र मिल चुके हैं।

भित्ति चित्र में पुरातन संस्कृति व परिवेश समाहित  
राधेश्याम राजवाड़े के द्वारा बनाए गए भित्ति चित्र शहर के शबरी एम्पोरियम में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। भित्ति चित्र में वे आधुनिकता को नहीं बल्कि पुरातन संस्कृति व ग्रामीण परिवेश को समाहित किया है। इनके भित्ति चित्र में पुराने समय के जलस्त्रोत सहित ग्रामीण परिवेश का कई अद्भुत नजारा देखने को मिल जाएगा, जो इनकी दिमागी उपज है। राधेश्याम कहते हैं कि भित्ति चित्रकला उनका शौक है, इससे उन्हें आय हो या न हो, खुद को शकून मिलता है।

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