अंबिकापुर। एक सप्ताह पूर्व जंगल में लकड़ी लेने गए ग्रामीण पर भालू ने हमला कर दिया था। भालू के हमले में ग्रामीण के चेहरा बुरी तरह से जख्मी हो गया था। परिजन उसे इलाज के लिए राजमाता देवेंद्र कुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध अस्पताल लेकर पहुंचे। सीटी स्कैन में पता चला कि ग्रामीण के जबड़ा, आंख व नाक की हड्डी टूट चकी हैं। अस्पताल के दंत रोग विभाग के एचओडी डॉ.ऐश्वर्या सिंह व दंत चिकित्सक सर्जन डॉ.अभिषेक हरीश ने लगभग ढाई घंटे का सफल ऑपरेशन कर ग्रामीण की जान बचाई।
जानकारी के अनुसार जशपुर जिले का सुगना राम 30 वर्ष एक सप्ताह पूर्व जंगल में लकड़ी लेने के लिए गया था। जंगल में ही भालू ने उस पर हमला कर दिया। भालू ने उसके चेहरे को बुरी तरह से नोच डाला था। स्वजन उसे इलाज के लिए जशपुर जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, यहां के चिकित्सकों ने उसकी स्थिति देखकर बेहतर उपचार के लिए रेफर कर दिया। स्वजन उसे राजमाता देवेंद्र कुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय अंबिकापुर से संबद्ध अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां दंत रोग विभाग के सर्जन चिकित्सक डॉ.अभिषेक हरिश ने मरीज का सीटी स्कैन कराया। सीटी स्कैन में पता चला कि भालू के हमले में मरीज से जबड़े, आंख व नाक की हड्डी टूट चुकी है। ऑपरेशन के लिए इंप्लांट की आवश्यकता थी। डॉ.अभिषेक ने इसकी जानकारी अस्पताल अधीक्षक डॉ.लखन सिंह को दी। उन्होंने अस्पताल के खर्च पर 35 हजार रुपये का तीन इंप्लांट मंगवाकर दिलवाया। इसके बाद दंत चिकित्सक डॉ.अभिषेक हरिश ने एचओडी डॉ.ऐश्वर्या सिंह की मदद से मरीज का ढाई घंटे तक सफल ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई। घायल ग्रामीण के चेहरे की सिलाई में चिकित्सक को एक घंटे लगे। अगर ही ऑपरेशन निजी अस्पताल में होता तो कम से कम दो लाख रुपये की चपत लगती।
चेहरे की सिलाई करने में लगे एक घंटे-
डॉ.अभिषेक हरिश ने बताया कि मरीज का ऑपरेशन करना बड़ा जटिल था। भालू ने अपने नाखून से मरीज के चेहरे को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया था। ऑपरेशन के बाद चेहरे को सिलाई करने में करीब एक घंटे का समय लग गया। चेहरे के जख्म को भरने में अभी समय लगेगा। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति ठीक है, उसे खाने-पीने में होने वाली दिक्कत से भी निजात मिल जाएगी।
निजी संस्थान में लगती दो लाख की चपत-
ग्रामीण को जिस गंभीर स्थिति में लाया गया था, उसे देखते हुए जीवनरक्षा की उम्मीद काफी कम थी, फिर भी अस्पताल अधीक्षक डॉ.लखन सिंह के सहयोग से ऑपरेशन के लिए इंप्टालंट की कमी दूर हुई, जो मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उपलब्ध नहीं था। अधीक्षक डॉ.लखन सिंह द्वारा बाहर से 35 हजार रुपये की लागत से इंप्लांट मंगवाया गया। चिकित्सकों की मानें तो निजी अस्पताल में ऑपरेशन में लगभग दो लाख खर्च पड़ता। शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध अस्पताल में ऑपरेशन पूरी तरह निश्शुल्क किया गया है।

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