अम्बिकेश गुप्ता
कुसमी/अम्बिकापुर। सरगुजा संभाग के बलरामपुर-रामानुजगंज जिला अंतर्गत कुसमी ब्लाक के राजेंद्रपुर कुदाग निवासी शहीद लागुड़ नगेसिया का 109 साल बाद 4 फरवरी 2022 को अंतिम संस्कार ग्राम सामरी कुटकु के हेटडाढ़ी पकरीडीपा में हुआ। लागुड़ नगेसिया के अंतिम संस्कार में भारी संख्या में समाज व अन्य वर्ग के लोग पहुंचे हुए थे। नगेसिया समाज के लिए आज का दिन काफी ऐतिहासिक है। कार्यक्रम स्थल पर 400 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी। अंतिम संस्कार में समाज के लोगों ने लागुड़ नगेसिया हमेशा अमर रहेंगे अमर रहेंगे के नारे लगाकर उन्हें विदाई दी। साथ ही सहपाठी बिगुड बनिया अमर रहें के नारे लगाए गए।

अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शहीद लागुड़ नगेसिया का शुक्रवार को 109 साल बाद अंतिम संस्कार हुआ। संसदीय सचिव चिंतामणि महाराज के विशेष प्रयास से सालों बाद आज अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। ब्रिटिशकाल के दौरान 1913 में लागुड़ को अंग्रेजों ने मृत्युदंड दिया था। अंग्रेजों ने उन्हें खौलते तेल में डालकर मारा था और कंकाल को सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के सबसे पुराने स्कूल में एडवर्ड स्कूल व वर्तमान के मल्टी परपज स्कूल में विज्ञान के स्टूडेंट को पढ़ाने के नाम पर रखा हुआ था,जिसे आदिवासी समाज के लोग उनके परिजन को देने की मांग कर रहे थे,ताकि वे उनका अंतिम संस्कार कर सकें। स्कूल में विज्ञान के छात्रों को पढ़ाने के हिसाब से कंकाल को रखने की बात कही जा रही थी,लेकिन समाज के लोग प्रश्न उठा रहें हैं कि वर्ष 1913 में जब कुसमी इलाके के लागुड़ नगेसिया शहीद हुए, तब स्कूल भवन में इतनी बड़ी पढ़ाई भी नहीं होती थी कि वहां किसी का कंकाल रखकर पढ़ाई कराई जाए।

गौरतलब है कि सरगुजा संभाग के बलरामपुर जिला स्थित कुसमी ब्लाॅक के राजेंद्रपुर कुदाग निवासी लागुड़ नगेसिया कुदाग गांव में घर-जमाई रहता था। इसी दौरान उसका झुकाव झारखंड में चल रहे टाना भगत नामक आंदोलनकारी के शहीद होने के बाद टाना आंदोलन से हुआ. इसके बाद वह आंदोलन में शामिल हुआ और लागुड़ के साथ बिगूड और कटईपतरा जमीरपाट निवासी थिथिर उरांव के साथ आंदोलन करने लगे. उन्होंने अंग्रेजों के लिए काम करने वालों को मार डाला. इसके बाद 1912-13 में थीथिर उरांव को घुड़सवारी दल ब्रिटिश आर्मी ने मार डाला और लागुड़ बिगुड़ को पकड़कर ले गए. कहा जाता है कि उसके बाद दोनों को खौलते तेल में डालकर मार डाला गया. इनमें से एक लागुड़ के कंकाल को तब के एडवर्ड स्कूल और वर्तमान के मल्टी परपज स्कूल में विज्ञान के स्टूडेंट को पढ़ाने के नाम पर रख दिया गया. लागुड़ बिगुड़ की कहानी सरगुजा क्षेत्र में लागुड़ किसान और बिगुड़ बनिया के रूप में आज भी प्रसिद्ध है।

लागुड़ की बेटी और दामाद की साल भर पहले हो चुकी मौत लागुड़ की नातिन मुन्नी नगेसिया चरहट कला ग्राम पंचायत में रहती है. मुन्नी की मां ललकी, लागुड़ की बेटी थी. ललकी की शादी कंदू राम से हुई थी. एक साल पहले ललकी और कंदू की मौत हुई. चरहट कला के सरपंच मनप्यारी भगत के पति जतरू भगत बताते हैं कि लागुड़ का दामाद कंदू हमेशा गांव में अपने ससुर की कहानी सुनाता था और कहता था कि गांव में उनकी मूर्ति स्थापना करनी चाहिए, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है.
वर्षो पूर्व संत गहिरागुरु ने कराया था प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार, अब पुत्र चिंतामणि महराज के प्रयास से विधिवत अंतिम संस्कार

1982 में संत गहिरा गुरु ने लागुड़ की आत्मा की शांति के लिए प्रतीकात्मक रूप से रीति रिवाज से कार्यक्रम कराया गया था. वहीं हाल ही में 25 जनवरी को सर्व आदिवासी समाज के लोगों ने कलेक्टर से लागुड़ के कंकाल को उनके परिजन को दिलाने मांग की थी. इसकी जानकारी चिंतामणि महराज को भी दी गईं. जिसके फलस्वरूप मामले को गति देते हुवे समाजिक हित में चिंतामणि महराज की पहल पर लंबे समय के परिश्रम बाद आज के दिन लागुड नगेसिया का विधिवत अंतिम संस्कार सम्पन्न किया गया. अंतिम यात्रा में संसदीय सचिव व विधायक चिंतामणि महराज ने भी अर्थी को कांधा दिया। लागुड नगेसिया के बेटी के नाती रामचंद्र नगेसिया कुदाग निवासी ने मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार किया व बाद में दफन किया गया।

भाजपा के दिग्गज नेता नंदकुमार साय भी पहुँचे

लागुड नगेसिया के अन्तिम संस्कार की जानकारी आस-पास जिला सहित पड़ोसी राज्य झारखंड में जा पहुंची. अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल होने दूर दराज से समाज के लोग पहुँचे. इसी बीच भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय भी पहुँचे जिन्होंने पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी.

भ्रम के बीच हुवा अंतिम संस्कार

लागुड नगेसिया के अंतिम संस्कार को लेकर समाज को लोगों के बीच कई तरह की बाधा उतपन्न हुई. समाज के कुछ वर्गों ने कहा कि अस्थि को धरती माता को जिम्मा देते हुवे मिट्टी के अंदर दफन कर दिया जाए तो कईओ ने कहा कि अग्नि के हवाले कर दिया जाए. इस विचार के बीच समाज के लोग बिलखते भी रहें. जिसे लेकर करीब आधा घंटे तक विचार चलता रहा. हालांकि समाज के कुछ लोग मान रहें थें की विधायक चिंतामणि महराज का विचार हैं कि मुखग्नि ही दिया जाए. हालांकि विधायक चिंतामणि महराज ने दोनों तरह की अंतिम संस्कार को लेकर तैयारियां करवा दी थीं. तथा व्यक्त हालतों से खुद को दूर रखना ही उचित समझा. परिजनों के इच्छा अनुसार अस्थि को मुखग्नि दिया गया.

नहीं जला कंकाल फिर उसे दफनाया गया

लागुड़ नागेसिया का कंकाल परिजनों द्वारा अंतिम संस्कार जलाकर किया जा रहा था परंतु कंकाल थोड़ा भी नहीं जला जिसके बाद उक्त कंकाल को सामाजिक रीति रिवाज से उक्त स्थान पर ही दफन किया गया. वही कंकाल की नहीं जलने की घटना से समाज में चर्चा का विषय था समाज के वरिष्ठ जनों का कहना था कि लागुड़ सिद्ध पुरुष था तथा समाज के रीति रिवाज से हटकर उसका अंतिम संस्कार के करण अस्थि नहीं जला. अंततः परिजनों व समाज के लोग रिती रिवाज से उसे दफनाया.

Categorized in: