0 छात्र-छात्राओ को नही मालुम प्रदेश के मुखिया, शिक्षा मंत्री व जिले के कलेक्टर तक का नाम

0 जबकि…. महिने के शुक्रवार को क्षेत्र के दौरे पर रहते है कलेक्टर

चंचलेश श्रीवास्तव

सूरजपुर। यह कैसी शिक्षा की गुणवत्ता है जहां के हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्रों को अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री व जिले के कलेक्टर तक का नाम नहीं मालूम है। शर्मसार करती यह शिक्षा व्यवस्था उस जिले की है जो स्कूल शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम का गृह जिला है। जी हां हम बात कर रहे है सूरजपुर जिले के दूरस्थ बिहारपुर क्षेत्र के रामगढ़ के कक्षा 12वीं में अध्ययनरत बच्चो का जो बकायदा आंटो की सवारी कर बिहारपुर स्कूल पढ़ाई करने जा रहे थे। बच्चों को बेहतर व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले इसके लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल सहित अन्य योजनाओं के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में लगे हुए है। वहीं जिले के मुखिया डॉ गौरव कुमार सिह भी छात्र-छात्राओ के बीच पहुचकर छात्रो को अपने लक्ष्य की प्राप्ति कैसे करनी है, अपने भविष्य को कैसे संवारना है इस बात की जानकारी एक मोटिवेशनल कार्यक्रम भव्य दृष्टि युवा सृष्टि के माध्यम से चला रहे है। जिसकी शुरुआत उन्होंने 6 दिसंबर को सूरजपुर के महाविद्यालय से प्रारंभ किया है और छात्रों के बीच पहुंच सरल और सौम्य तरीके से संवाद कर उन्हें जीवन मे सफलता का मूलमंत्र दे रहे है। शिक्षा विभाग भी जिले में गुणवत्ता युक्त शिक्षा बच्चो को मिल रही है कहते हुए अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकता है। मगर जिले की बदहाल शिक्षा व्यवस्था कुछ और ही बयां कर रही है। शिक्षा की स्थिति जिले में कैसी है इसका अंदाजा दुरस्थ क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था को देखकर लगाया जा सकता है जो शिक्षा की गुणवत्ता को शर्मसार कर रही है। शिक्षा का यह कैसा स्तर है कि हाई स्कूल के छात्रों तक को प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री व कलेक्टर तक का नाम नहीं मालूम यह स्थिति है 12 के छात्र-छात्राओ की। यह अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारियों की हकीकत बताने के लिए काफी है। आप को बता दें कि बुधवार की सुबह जिले के दूरस्थ बिहारपुर क्षेत्र के ग्राम कोल्हुआ के पास छात्र-छात्राओ को लेकर नही बल्कि ठूंसकर एक आटो फर्राटे भर्ती आ रही थी। उसे रुकवाने पर पता चला कि इसमें बैठे बच्चे स्कूल पढ़ने के लिए जा रहे है। जिसमे कई रामगढ के थे।उन्होने बताया कि गांव व आसपास में 11-12वीं की स्कुल नही है जिससे वे 20-25 किलोमीटर के बडे बडे गढडो से भरे हिचकोले भरे रास्ते का सफर आटो से तय कर स्कुल पहुचते है और शाम 6-7 बजे घर वापसी होता है। फुलकुवंर, रीना सहित कई छात्राओ से जिले के कलेक्टर का नाम पुछा गया तो नही बता पाये जबकि महिने में दो चार बार बिहारपुर क्षेत्र में काफिला के साथ दौरा करते है। प्रदेश के मुख्यमंत्री,शिक्षा मंत्री सहित प्रधानमंत्री के बारे पुछा गया तो वह भी सही नही बता सके। अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह की शिक्षा व्यव्स्था का आलम है इस क्षेत्र में पहाड पर बसे गांव लुल्ह भुण्डा तेलाईपाठ में स्कुल भवन तक नही है। कागजो में प्राथमिक शाला माध्यमिक शाला संचालित है जो 15 अगस्त, 26 जनवरी में सिर्फ झण्डा फहराने के लिये स्कुल खुलता है।बेटी पढाओ बेटी बचाओ सहित महिला सशक्तिकरण, हिम्मत और अनेक कार्यक्रम जिला प्रशासन संचालित कर खुद की पीठ थपथा रहा है लेकिन दुरस्थ क्षेत्र में छात्राओ के लिए एक हास्टल तक नही उपलब्ध करा पा रहा है। जहां रहकर अच्छे अपना भविष्य गढ सके। दो बार स्वास्थ मंत्री टीएस सिहदेव भी आकर चले गये। लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। कुछ छात्राएं बिहारपुर के समीप किराये का मकान लेकर पढाई कर रही है। वही गरीब लाचार अभिभावक के बच्चो को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पडता है। दर्जन से अधिक गांव में विद्युत नही है सडके जर्जर दुसरी ओर कई ऐसे गांव है जहा पर स्कुल भवन नही है कागजो में स्कुल संचालित होती है। छात्र छात्राएं लालटेन की रौशनी में पढ रहे है। बहरहाल इस क्षेत्र में नेता, मंत्री, अधिकारियांे की कार्यशैली पर ग्रामीणों ने बेहद नाराजगी जाहिर की है।

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