अंतिम पत्र वन विभाग की ओर से 17 मार्च 2026 को जारी करने के बाद कार्रवाई

अंबिकापुर। शहर से लगे ग्राम खैरबार, महामाया पहाड़ के डबरीपानी क्षेत्र में वन भूमि पर किए गए अवैध कब्जा को हटाने के लिए शुक्रवार को सुबह करीब 6 बजे वन विभाग की टीम पहुंच गई। कार्रवाई के पहले रातों-रात इन घरों में वन विभाग की टीम ने नोटिस चस्पा कर दिया था। इलाके के लोगों की नींद रात से ही उड़ी हुई थी। सुबह जब वे घर से बाहर निकले तो वन विभाग, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम बुलडोजर के साथ अतिक्रमण हटाने के लिए चौतरफा डट गई थी। इलाका पूरी तरह से पुलिस छावनी में तब्दील था। प्रशासनिक टीम ने लाउड सिस्टम से यहां रहने वाले लोगों से अपना सामान, मवेशी घर से बाहर निकालने का आग्रह किया, इसके बाद वन भूमि में कब्जा करके बनाए गए 20 मकानों को ढहा दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, महामाया पहाड़, डबरीपानी आरएफ-2582 अंतर्गत वन भूमि में अवैध कब्जा करने वाले अतिक्रमणकारियों को अंतिम पत्र वन विभाग की ओर से 17 मार्च 2026 को जारी किया गया था। नोटिस देने के बाद भी किसी ने अवैध कब्जा हटाने में रूचि नहीं ली। इसके बाद पुन: वन विभाग की ओर से संबंधित घरों में नोटिस चस्पा करके घरों को खाली करने और अतिक्रमण हटाने कहा था, इसके बाद भी अवैध कब्जा नहीं हटा। इधर डबरीपानी इलाके में कार्रवाई के दायरे में आने वाले परिवारों के यहां रात में ही नोटिस चस्पा करके, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के लिए टीम, मशीनरी और मानव संसाधनों के साथ रात से ही तैयार थी। शुक्रवार को अलसुबह से ही आवश्यक दिशा-निर्देश देने के बाद जिला प्रशासन, वन विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम एक्सीवेटर वाहन के साथ डबरीपानी के लिए रवाना हो गई थी। क्षेत्र के शांत वातावरण को जब वाहनों के शोर और पहुंचे लाव-लश्कर ने अशांत किया तो, हडक़ंप मच गया। इलाके में भारी संख्या में तैनात पुलिस बल के साथ प्रशासनिक टीम ने बुलडोजर चलाने से पहले लाउड स्पीकर के माध्यम से संबंधित परिवारों को अपना कीमती सामान, मवेशी घर से बाहर निकाल लेने का समय दिया गया, इसके बाद वन भूमि में कब्जा करके बनाए गए 20 मकानों को ढहाने की कार्रवाई शुरू की गई। कार्रवाई की तीव्रता को देखते हुए सामान्य विरोध के बाद कच्चे, पक्के चिन्हांकित मकानों में रहने वाले लोग स्वयमेव अपना सामान घर से बाहर निकालने लगे। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती थी।

भाजपा के वरिष्ठ नेता व पार्षद आलोक दुबे ने की थी शिकायत

डबरीपानी क्षेत्र में लम्बे समय से बाहरी लोगों के द्वारा वन विभाग की संरक्षित भूमि पर कब्जा करके पक्के और कच्चे मकान बना लिए गए थे। इसकी शिकायत भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पार्षद आलोक दुबे ने की थी। इसके बाद वन विभाग के अधिकारियों ने मौका निरीक्षण किया और कार्रवाई की रणनीति तैयार की। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि, कब्जाधारकों को पहले ही नोटिस जारी करके वन भूमि को कब्जामुक्त करने आगाह कराया था, लेकिन तय समय सीमा के बीच अतिक्रमण नहीं हटाया गया। प्रशासनिक तंत्र के द्वारा लगातार अतिक्रमण हटाने की जा रही कार्रवाई के बीच चर्चा इस बात की हो रही है कि, जांच का दायरा शासकीय संपत्ति की खरीद-बिक्री में महति भूमिका निभाने वालों तक कब तक पहुंचेगा।

कब्जा करते समय कहां थे जंगल के रखवाले

सवाल यह उठ रहा है कि, शहर के करीब बड़े पैमाने पर अवैध कब्जा किसके शह पर हुआ, यह अभी तक अस्पष्ट है। कब्जा स्थलों पर जिस प्रकार कच्चे मकानों के बाद पक्के मकान तैयार कर लिए गए, इससे यह तो स्पष्ट है कि, वन अमले के मैदानी अमले की नजर हो रहे कब्जा व मकानों के निर्माण के लिए विभिन्न साधनों से पहुंचाने वाले निर्माण सामग्री पर पड़ती होगी, लेकिन तत्समय कब्जा करने वालों को नहीं रोका गया। नवागढ़, चोरकाकछार, खैरबार से लगे इलाके में बड़े स्तर पर कब्जा की शिकायत वरिष्ठ भाजपा नेता, पार्षद आलोक दुबे के द्वारा साक्ष्य के साथ की गई। निरंतर शिकायतों और साक्ष्यों के बाद इन्हें अतिक्रमण नजर आया, और वन भूमि को कब्जामुक्त करने की कार्ययोजना को मूर्तरूप दिया गया।

स्थगन आदेश प्राप्त लोगों को मिली राहत

वन विभाग ने कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए 39 कब्जाधारियों को बेदखली का अंतिम नोटिस जारी किया था। गुरुवार की रात को भी विभाग की टीम ने घर-घर जाकर नोटिस चस्पा किया और कब्जा खाली करने की आखिरी चेतावनी दी। इस दौरान कुछ लोगों के द्वारा न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त करना पाया गया। इस कारण उन निर्माणों को फिलहाल छोड़ दिया गया है, लेकिन जिन लोगों के पास कोई स्थगन आदेश या कानूनी दस्तावेज नहीं था, उनके मकानों को ढहाने की कार्रवाई की गई।

शासकीय अमले और जमीन का हस्तांतरण करने वालों पर भी हो कार्रवाई: सिंहदेव

पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने अतिक्रमण हटाने को लेकर चल रही कार्रवाई के परिप्रेक्ष्य में कहा कि, नियमों के अनुरूप वन अधिकार कानून जो 2006 में बना, उसके अंतर्गत जो भी नागरिक वन भूमि में 13 दिसम्बर 2005 तक काबिज हैं, आदिवासी या गैर आदिवासी परिवार, इनका तीन पीढ़ी का निस्तार उस क्षेत्र के जंगल में हो, कब्जा भले एक दिन का हो तो पात्रता बनती है। सर्वे भी हुए, लोगों को चिन्हांकित भी किया गया, काफी पहल करने के बाद भी वन विभाग और ट्रायबल विभाग कई पात्र लोगों को वन अधिकार पत्र नहीं दिया। ऐसे में जो पात्र लोग हैं, उन पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जो पात्र नहीं हैं, और उन्होंने अतिक्रमण 13 दिसम्बर 2005 के बाद में किया है, तो ऐसे लोगों को कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों की जमीन वन क्षेत्र से बाहर है। आनलाइन नक्शा देंखे तो कब्जा वाला स्थल राजस्व भूमि दिखाता है, वन अमला इसे वन भूमि बताकर कार्रवाई करता है। नजूल व राजस्व क्षेत्र में कब्जा की व्यवस्थाएं अलग हैं। इसमें वन विभाग हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। सिंहदेव ने कहा कि, उन्होंने इस ओर जिला प्रशासन से बात की है। पहले कब्जा करने देना, हजारों, लाखों रुपये खर्च करके मकान बन जाने और सर्व सुविधाओं को प्राप्त करने के बाद, ऐसी बातों के उठने पर कार्रवाई होती है। उन्होंने कहा प्रशासन की मौन सहमति के बिना कब्जा नहीं हो सकता है, ऐसे में सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। सुनने में यह भी आया है कि, सरकार की जमीन को बिचौलिये, भू माफिया के माध्यम से डेढ़-दो लाख रुपये लेकर हस्तांतरण किए हैं, इस पर भी कार्रवाई की जरूरत है।

बयान

वन विभाग की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराना विभाग की प्राथमिकता है। कब्जाधारियों को पर्याप्त समय और वैधानिक नोटिस दिया गया था, लेकिन स्थिति यथावत रही। इसके बाद कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प शेष था। मानवीय संवेदना को ध्यान में रखते हुए घरों से सामान बाहर निकालने का इन्हें अवसर दिया गया, इसके बाद कार्रवाई शुरू की गई है। आने वाले दिनों में अन्य क्षेत्रों से भी चिन्हित अतिक्रमणों के खिलाफ बेदखली की कार्रवाई की जाएगी।

श्वेता कामभोज, अनुविभागीय अधिकारी (वन)

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