कांकेर। महिला नक्सल एरिया कमांडर को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह मुठभेड़ कांकेर जिले में छोटे बेठिया पुलिस थाना क्षेत्र के जंगलों में हुई, मारी गई महिला नक्सली पर 5 लाख रुपये का इनाम घोषित था। पुलिस अधीक्षक निखिल रखेचा ने बताया कि मारी गई महिला नक्सली की पहचान‘रूपी’के तौर पर हुई है, जो माओवादियों की प्रतापपुर एरिया कमेटी की सदस्य थी।

मुठभेड़ छोटे बेठिया इलाके में हुई
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि मुठभेड़ आज सुबह छोटे बेठिया पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक वनक्षेत्र में तब हुई जब सुरक्षाबल नक्सल रोधी अभियान पर था। उन्होंने बताया कि घटनास्थल से एक महिला नक्सली का शव और एक हथियार बरामद किया गया है। अधिकारी ने बताया कि इलाके में अब भी अभियान जारी है और विस्तृत जानकारी का इंतजार है। यह घटना 31 मार्च को सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को सशस्त्र माओवादी मुक्त घोषित किए जाने के 12 दिन बाद हुई है। बता दें कि इस साल 31 मार्च को सरकार ने छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया। सुरक्षा बलों द्वारा घने जंगलों में चलाए गए अथक अभियान के बाद उग्रवादियों का कोई नेता या कैडर नहीं बचा, जिनमें से अधिकतर या तो मारे गए हैं या उन्होंने हथियार डाल दिए हैं।

अमित शाह ने कहा कि देश नक्सल मुक्त हो चुका हैं जो हथियार उठाएगा कीमत भी चुकाएगा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च लोकसभा में देश नक्सलवाद से मुक्त होने का ऐलान किया था। उन्होंने वामपंथी नक्सलवाद को विदेशी विचारों का परिणाम बताते हुए कहा था कि हिंसा के लिए देश में कोई जगह नहीं है और शांति की इच्छाशक्ति की बदौलत ही मोदी सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने में कामयाबी हासिल की है। अमित शाह ने कहा कि देश नक्सल मुक्त हो चुका है और अब जो हथियार उठाएगा, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

चार दशक से अधिक समय बाद छत्तीसगढ़ में माओवादी सशस्त्र आंदोलन का अंत
गौरतलब है कि, बीते महीने चार दशक से अधिक समय बाद छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादी सशस्त्र आंदोलन का अंत हो गया। केंद्र सरकार द्वारा तय समयसीमा के तहत 30 मार्च 2026 को इस क्षेत्र को वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से मुक्त घोषित कर दिया गया। दरअसल, 1980 के दशक में माओवादी पड़ोसी आंध्र प्रदेश में पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते दंडकारण्य के जंगलों, विशेषकर बस्तर में पहुंचे थे, जहां उन्होंने इसे अपने ठिकाने के रूप में विकसित करने की कोशिश की। एक छोटे वैचारिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे सशस्त्र विद्रोह में तब्दील हो गया, लेकिन पिछले एक दशक में इसके प्रभाव में लगातार गिरावट आई है।

 

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