विशेष परिस्थितियों में 500 से 1000 रुपये तक ही लेते हैं कर्ज

अंबिकापुर। पहाड़ी कोरवा को सरकार द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति में शामिल किया गया है। इनका रहन-सहन औरों से बिल्कुल भिन्न होता है। ये जंगल व पहाड़ों पर रहना पसंद करते हैं। इन्हें बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं होता, ये अपने में ही मस्त रहते हैं। महर्षि चार्वाक ने लिखा है ‘यावेत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेतÓ। अर्थात जब तक जियो सुख से जियो, ऋण करके भी घी पीयो। वर्तमान समय में लोगों की स्थिति कुछ इसी तरह की है। इसके उलट कर्ज पहाड़ी कोरवा की परंपरा व जीवनवृत्त का हिस्सा नहीं है। जितनी जरूरत उतनी कमाई, इनकी खासियत है। यदि कभी जरूरत पड़ गई तो 500 से 1000 तक का ही ये कर्ज लेते हैं।
आज के दौर में लोग चकाचौंध में रहते हैं। हर कोई शहरीकरण की दौड़ में शामिल होना चाहता है। अच्छे कपड़े, जूते व खान-पान के शौकीन है, लेकिन पहाड़ी कोरवा की जीवन शैली, रहन-सहन व काम करने का तरीका भी अन्य लोगों से अलग होता है। पहाड़ी कोरवा उतना ही कमाते हैं जितने में परिवार का गुजारा हो सके। ये सप्ताह में सिर्फ 2-3 दिन ही काम करते हैं, बाकी दिन आराम करते हैं। विशेष परिस्थितियों में यदि उन्हें पैसे की जरूरत पड़ गई तो किसी से 500 या 1000 रुपए उधार ले लेते हैं। इससे ज्यादा ये कर्ज लेना भी पसंद नहीं करते। यदि ये कर्ज नहीं चुका पाते हैं तो कर्ज देने वाले के घर हरवाही या मजदूरी कर चुका देते हैं।
ऐसी होती है इनकी जीवन शैली
पहाड़ी कोरवा जनजाति जंगल और पहाड़ों पर रहना पसंद करते हैं। जंगली जानवरों का शिकार व कंद, मूल इनका मुख्य आहार होता है। ये अपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैं। पेड़ों के पत्ते, लकडिय़ों व घास-फुस से अपना घर बनाते हैं। परिवार के पुरुष सदस्य कपड़े के नाम पर शरीर पर एक गमछा, लुंगी व टी-शर्ट पहनते हैं, जबकि महिलाएं साड़ी या धोती पहनती हैं। इस जनजाति का खान-पान भी अलग है। ये लोग मिट्टी के बर्तन में खाना बनाते हैं। चोंगी (पत्तों से बना पात्र) में खाना खाते हैं। कम संसाधन में ही ये बहुत अच्छा जीवन व्यतीत करते हैं। ये आम लोगों से दूरी बनाकर रखना पसंद करते हैं।
तीर-धनुष टांगकर करते हैं नृत्य
पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोग मनोरंजन और तीज त्यौहार में कर्मा नृत्य करते हैं। इनका कर्मा, सोदे कर्मा नृत्य कहलाता है। एक डंडा गाड़कर उसमें झाड़ू लगाते हैं, फिर धनुष-बाण टांगकर अलग ही वाद्ययंत्र से ये नृत्य करते हैं।
मौत के बाद त्याग देते हैं घर
2010 में पहाड़ी कोरवा जनजाति पर शोध में अनोखी परंपरा सामने आई थी। एक पहाड़ी कोरवा के घर पर अगर किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो परिवार वह घर छोड़ देता है। हर मृत्यु के बाद ये लोग नया घर बनाकर रहते हैं। यह परंपरा आज भी कायम है। 

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