कोरोना महामारी के कारण 22 मार्च से देश में लागू लाकडाऊन के दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों के पलायन ने भारत की जो तस्वीर बनाई है उसने देश और दुनिया में भारत की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है.. अपने बीबी बच्चों व परिवार सहित हजारों किलोमीटर की यात्रा पर अपने घर वापस जाने पैदल निकले हजारों मजदूरों की चिंता किसे है और किसे नहीं इस पर पक्ष विपक्ष के बीच अब तक केवल बहस ही होती रही और भूखे प्यासे बिलखते मजदूर अपने घर पहुंचने की आस में पांवों में छाले लिए चलते रहे.. सोशल मीडिया में प्रवासी मजदूरों की करूण व्यथा पर तीखी प्रतिक्रियाओं से जब जनता के द्वारा चुनी हुई सरकारों की किरकिरी हुई तब आनन फानन में ट्रकों,बसों व ट्रेनों का इंतजाम हुआ और इनमें ठूंस ठूंसकर भगवान भरोसे मजदूर ले जाये गये..
कहीं ट्रक पलटी, कहीं बस, कहीं गर्मी व भूखमरी के कारण किसी की जान चली गई तो कहीं ट्रेनों ने ही पैदल चल रहे मजदूरों को कुचल दिया.. बेबस मजबूर मजदूर काल का ग्रास बनने के आलावा कुछ न कर सके, जो जिंदा बचकर अपने गांव घर पहुंचे उन्हें 14 दिन क्वारंटीन सेंटर में बदइंतजामी के साथ छोड़ दिया गया.. हमारे देश को अपनी मेहनत के पसीने से गढ़ने वाले..जी हां..ये मजदूर ही हैं.. लाकडाऊन के दौरान समाचार चैनलों के डिबेट में राजनीतिक दलों के संवेदनहीन प्रवक्ता आरोप प्रत्यारोप में लगे रहे और किसने कितना किया इन मजदूरों के लिए यह बताने की प्रतिस्पर्धा चलती रही..परंतु परिवार की रोजी रोटी छिन जाने वाला मजदूर भविष्य की चिंता में अब भी मौन था..? कोरोना ने उनका सब कुछ छीन लिया था..
ऐसी विषम व भयावह परिस्थितियों में जब मजदूरों के सर पर पिता की तरह सरकारी अमले का हाथ होना चाहिए था तब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों ने मदद का हाथ खींचकर अमानवीयता की सीमा पार कर दी.. केन्द्र व राज्य सरकारों में से किसी ने तो हिम्मत जुटाकर मजदूरों को ये संदेश देकर कभी कहा हो कि आपको पैदल घर जाने की जरुरत नहीं है आपको सकुशल घर पहुंचाना सरकार की जवाबदारी है..पर सरकारों को तो जैसे राहत पैकेज से मतलब था मजदूरों के लिए संवेदना उन्होने जनता व समाज सेवियों के लिए छोड़ रखी थी..
केन्द्र व राज्य सरकारों की कोरोना पर आपसी वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग में लाकडाऊन व राहत पैकेज तो चर्चा में रही पर कहीं भी प्रवासी मजदूरों की सकुशल घर वापसी का जिक्र नहीं हुआ.. अपने आपको संवेदनशील सरकार समझने वाली देश या प्रदेश की कोई भी सरकार प्रवासी मजदूरों के साथ सडक पर उनकी मदद के लिए खड़ी नहीं दिखी.. कडी धूप में पैदल चल रहे मजदूरों को भोजन पैकेट चाहिए था और एसी में बैठी सरकारें राहत पैकेज बांटती रही.. मजदूरों को साधन से घर पहुंचाने की जरूरत थी और सरकारें लाकडाऊन का पालन कराती रहीं..गरीब मजदूरों के लिए चुनाव पूर्व नारे लगाने वाली पार्टियां भी लाकडाऊन में लॉक हो गई..
पक्ष विपक्ष दोनों के लिए यह समय आपसी मतभेद भुलाकर मजदूरों की संवेदना में साथ खड़े दिखने का था परंतु दोनों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा व दलगत स्वार्थ ने मानवता को भी शर्मशार कर दिया.. केन्द्र व राज्य सरकारों के प्रवासी मजदूरों पर आरोप प्रत्यारोप व आपसी खींचतान के बावजूद इस कठिन घड़ी में देवदूत बनकर आये बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद जैसे लोंगों ने हजारों मजदूरों को अपनी बसों में उनके घर तक पहुंचाया.. #तुम मुझे पता दो.. मैं तुम्हें घर पहुंचाऊंगा.. का अभियान चलाकर दृढ संकल्प के साथ सोनू सूद की पूरी टीम ने मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए दिनरात एक कर किया.. अपनी पार्टी को गरीब मजदूरों की पार्टी कहने वाले राजनीतिक दलों के गालों पर मजदूरों के लिए नि:स्वार्थ काम कर रहे सोनू सूद जैसे लोगों ने ऐसा तमाचा जड़ा है जिसका दर्द उन्हें पीढीयों तक सालता रहेगा..
सोनू सूद से जब यह पूछा गया कि उन्हें मजदूरों को घर पहुंचाने की प्रेरणा कहां से मिली तो इसके जवाब में उन्होने जो कहा वह राजनीतिक दलों के लिए प्रेरणास्पद है.. उन्होने कहा कि जब मजदूरों ने उन्हें बताया कि वो अपने परिवार सहित हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव जाऐंगे तो उन्हें यकीन नहीं हुआ.. वो उनके नन्हे बच्चों के बारे में सोंचने लगे जिनकी यादों में इस कठिन यात्रा का दर्द ताउम्र रहेगा और जो बडे होकर इसे एक त्रासदी के रूप में याद रखेंगे.. इसी डर ने उन्हें मजदूरों की मदद करने के लिए प्रेरित किया.. सोनू जैसे सेवाभावी लोगों का कोटि कोटि धन्यवाद जिनके पुरूषार्थ ने मानवता को जिंदा रखा.. अंततः
कोरोना अपने विस्तार में हैै, लाकडाऊन रफ्तार में है और मजदूर इंतजार में है.. कि कब कोई सरकार आयेगा और उनके सर पर हाथ रखकर कहेगा.. मैं हूँ ना..

आलेख-
✒कवि संतोष सरल ,अंबिकापुर,

9826165324

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