छत्तीसगढ़ में चुनावी मुकाबला अन्य राज्यों से अलग है। यहां लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस के बजाय भाजपा बनाम भूपेश बघेल है। राज्य में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन भाजपा के निशाने पर कांग्रेस से ज्यादा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हैं। कांग्रेस की सारी राजनीति बघेल के इर्द-गिर्द होने से भाजपा सीधा निशाना उन पर ही साध रही है। इससे भाजपा राज्य में सत्ता विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश कर रही है, ताकि बदलाव के लिए मतदाताओं को तैयार किया जा सके।

छत्तीसगढ़ नया राज्य है और वहां आम तौर पर हर बार सत्ता परिवर्तन का रिवाज नहीं है। मध्य प्रदेश से अलग होकर 2000 में राज्य बनने के बाद विधायकों की संख्या के आधार पर कांग्रेस की सरकार बनी। उसके बाद 2003 में राज्य में चुनाव होने पर भाजपा की सरकार बनी, जो 15 साल तक चली। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ही रहे। बीते 2018 के चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ और कांग्रेस की सरकार भूपेश बघेल के नेतृत्व में बनी।

भाजपा सामूहिक नेतृत्व में कर रही तैयारी

भाजपा ने भी बीते पांच साल में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को तो नेतृत्व नहीं दिया, लेकिन किसी और नेता को भी आगे नहीं बढ़ाया। वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल और प्रेमप्रकाश पांडे जैसे नेता हाशिए पर हैं। प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव व नेता विपक्ष नारायण चंदेल का नेतृत्व नया है और उनको पार्टी के भीतर व बाहर पकड़ बनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ रही है। ऐसे में भाजपा सामूहिक नेतृत्व में तैयारी कर रही है, जिसकी कमान केंद्रीय नेतृत्व खुद संभाल रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ओम माथुर पूरी रणनीति के केंद्र में हैं। उनके पास संगठन व चुनाव की दोनों जिम्मेदारियां हैं।

रमन सिंह को नहीं बनाया चेहरा

राज्य में सत्ता विरोधी माहौल बनने में समय लगता है। जनता हर पांच साल में बदलाव जैसी स्थिति नहीं रखती है। ऐसे में भाजपा को सत्ता विरोधी माहौल खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। राज्य में भाजपा के बड़े नेता पूर्व सीएम रमन सिंह हैं, पर उन्हें पार्टी ने चुनावी चेहरा नहीं बनाया है। राज्य में संगठन व विधानसभा में कमान भी नए नेताओं को सौंपी गई है, जो राज्यव्यापी पकड़ बनाने में जुटे हैं। ऐसे में पुराने नेता काफी पीछे दिख रहे हैं।

कांग्रेस को बघेल पर भरोसा

दूसरी तरफ कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के इर्दगिर्द सिमटी है। 2013 में झीरम घाटी की घटना के बाद उनका वरिष्ठ नेतृत्व समाप्त हो गया था। इन नक्सली हमले में नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ला, मुदलियार समेत कई नेता मारे गए। जब 2018 में कांग्रेस सत्ता में आई तो बघेल को नेतृत्व मिला। दूसरे बड़े दावेदार टीएस सिंहदेव दूसरे नंबर पर रखे गए। बीते पांच साल में कांग्रेस नेतृत्व ने बघेल पर ही भरोसा जताया।

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