रामानुजगंज- लॉकडाउन के बाद बलरामपुर रामानुजगंज जिले के समस्त साप्ताहिक बाजार बंद होने से इसका खामियाजा उन ग्रामीणों को भी उठाना पड़ रहा है जो विभिन्न उत्पाद दलहन, तिलहन, गेहूं, महुआ, वनोपज सहित अन्य सामग्री बाजार में बेचने आते थे जब साप्ताहिक बाजारों में खरीददार अधिक होते थे तो क्रेताओं में प्रतिस्पर्धा के कारण ग्रामीणों को उचित मूल्य मिल जाता था परंतु अब स्थिति यह है कि औने पौने दाम में ग्रामीण अपने सामग्री को बेचने को मजबूर है। जिससे इसका सीधा असर ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है।

गौरतलब है कि बलरामपुर रामानुजगंज जिले के हर तीन से चार गांव के बीच सप्ताह के अलग अलग दिनों में साप्ताहिक बाजार लगता है। वही जिले में कई बड़े-बड़े भी साप्ताहिक बाजार लगते हैं जहां दर्जनों गांव के लोग बाजार करने आते हैं जहा कपड़ा, किराना, इलेक्ट्रॉनिक, सब्जी सहित अन्य जरूरत की चीजो कि दुकाने लगती है तो वही यहां बड़ी संख्या में गल्ला, दलहन, तिलहन, वनोपज सहित अन्य सामग्री जो ग्रामीणों के द्वारा साप्ताहिक बाजार में बेचने हेतु लाया जाता है उसके खरीदार भी रहते हैं अधिक खरीदार रहने से ग्रामीणों को अपना उत्पाद बेचने में सुविधा रहती है कि वह अपना माल किसी से भी बेच सकें इससे उनको अच्छा रेट भी मिल जाता था परंतु लॉकडाउन के बाद स्थितियां विपरित हो गई है अब ग्रामीण अपने पसीने की कमाई को औने पौने दामों में बिचोलियों के हाथों बेचने को मजबूर हैं। अभी के सीजन में महुआ, साल बीज, सरसो, तीसी, मक्का सहित विभिन्न प्रकार के वनोपजों को ग्रामीण लेकर साप्ताहिक बाजारों में आते थे जिनका उन्हें उचित मूल्य मिलता था परंतु साप्ताहिक बाजार बंद होने से स्थिति ऐसी हो गई है कि ग्रामीणों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है एवं उनमें गहरी निराशा भी है।

साप्ताहिक बाजार पर निर्भर रहने वाले दुकानदारों की टूटी कमर- एक ओर जहां ग्रामीणों को उनके साप्ताहिक बाजार में लाए जाने वाले विभिन्न सामग्री का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है तो वहीं सैकड़ों ऐसे दुकानदार है जो साप्ताहिक बाजार पर ही निर्भर है वह कहीं स्थाई रूप से दुकान नहीं करते बस सिर्फ सप्ताहिक बाजार में ही दुकान लगाते हैं ऐसे साप्ताहिक बाजार करने वाले दुकानदारों की अब आर्थिक कमर पूरी तरह से टूट चुकी है।

ग्रामीणों को विभिन्न उत्पादों के मूल्य का भी नहीं चल पा रहा है पता- साप्ताहिक बाजार नहीं लगने से जो ग्रामीण बाजार करने आते थे वे अब नही आ रहे है जिससे उन्हें उनके द्वारा उत्पादित या संग्रहित की गई जो सामग्री है उसका उचित मूल्य उन्हें पता नहीं चल पा रहा है जिसका पूरा फायदा बिचौलिए उठा रहे हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जान है साप्ताहिक बाजार – करीब-करीब जिले के हर तीन चार गांव के बीच लगने वाला साप्ताहिक बाजार ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जान होती है परंतु कोरोना महामारी के चलते हुए लॉकडाउन के बाद साप्ताहिक बाजार के बंद हो जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी चौपट हो रही है।

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