मुनाफाखोर अस्पतालों की मनमानी रोकने में सरकार व प्रशासन नाकाम


अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव एक ओर आम जनता के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने व कैशलेस इलाज की व्यवस्था का प्रयास कर रहे हैं, वहीं कार्पोरेट कंपनियों की तरह चलाए जा रहे निजी अस्पतालों को जिला प्रशासन व स्वास्थ्य प्रशासन ने मरीजों की सेवा के नाम पर लूट की छूट दे दी है। निजी अस्पताल नोट छापने की मशीन बन गए हैं। समाज की सेवा करने के बजाय इनका मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना है। सरकार भी मुनाफाखोर अस्पतालों की मनमानी रोकने में नाकाम है। मरीजों के स्वजनों से इलाज के नाम पर लाखों रुपये की वसूली शहर के ही कई नामचीन निजी अस्पतालों में की जाती है। ऐसे मामले प्रशासन, पुलिस के संज्ञान में असमय आते रहते हैं। प्रशासनिक नियंत्रण के अभाव और अस्पताल संचालकों की राजनैतिक पार्टी सत्ता पक्ष, विपक्ष दोनों से तालमेल होने के कारण अवैध अस्पतालों के संचालन की रफ्तार बढ़ती ही जा रही है।


विदित हो कि शहर में नियमों को ताक में रखकर निजी अस्पताल, नर्सिंग होम एवं सुविधा के नाम पर जांच केंद्रों का संचालन जिला व स्वास्थ्य प्रशासन के रहमोकरम पर धड़ल्ले से चल रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इन्हें लाइसेंस देने का अधिकार डीएचओ को है, जिसका अध्यक्ष कलेक्टर होते हैं। अक्सर देखने को मिलता है, इन अस्पतालों में एक प्रशिक्षत डॉक्टर होते हैं, जिसकी डिग्री का सार्वजनिक उल्लेख किया जाता है, अंदर अप्रशिक्षित, कम जानकार डॉक्टर इलाज, ऑपरेशन करने तक से नहीं चूकते हैं। इन अस्पतालों में मरीजों से फीस के अलावा अलग-अलग तरह के चार्ज वसूले जाते हैं। इनके लिए सरकार के द्वारा निर्धारित किए गए मानक मायने नहीं रखते। निजी अस्पतालों में मिलने वाली सुविधाओं, इलाज व उस पर होने वाले खर्च का कोई बोर्ड भी देखने को नहीं मिलेगा।

एजेंटों की सरकारी अस्पतालों में मजबूत पकड़ :-


शहर के निजी अस्पतालों के एजेंट सरकारी अस्पताल के इर्द-गिर्द मंडराते मिल जाएंगे। इस कार्य में निजी एंबुलेंस चालक भी लगे रहतेे हैं। शासकीय अस्पताल के अधिकांश चिकित्सकों के द्वारा निजी अस्पतालों में सेवा देने के कारण मरीजों और इनके स्वजनों को बहला-फुसलाकर लाना इनके लिए बाएं हाथ का खेल है। कई बार चिकित्सकों के द्वारा स्वयं निजी अस्पतालों का राह दिखाने जैसा मामला सामने आ चुका है। इस कार्य में शासकीय अस्पताल के कुछ कर्मचारियों की भूमिका अहम रहती है, जो पिछले दरवाजे से मरीजों को रेफरल या फिर बिना रेफर कराए भेजने में सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों, दवा दुकानों में भी इनके शागिर्द रहते हैं, जो विशेषकर ग्रामीणों को अपना शिकार बनाते हैं। मेडिकल माफियाओं का पूरा सिस्टम कमीशन खोरी पर आधारित रहता है।


पुलिस तक पहुंच चुका है ऐसा मामला :-
शहर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल से मरीजों को गुमराह करने का पूर्व चिकित्सा अधीक्षक डॉ.आरके दास, डॉ.लखन सिंह के कार्यकाल में सामने आ चुका है। इनके द्वारा लगाई गई बंदियाों का सार्थक परिणाम सामने आया और बाहरी एंबुलेंसों के अस्पताल परिसर में प्रवेश पर रोक लगी थी। यही नहीं वार्ड में एप्रन पहनकर निजी अस्पताल की एक महिला दलाल को राउंड के समय अधीक्षक डॉ.दास ने स्वयं पकड़ा था, जो मरीज के स्वजनों को गुमराह कर बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पताल ले जाने की तैयारी में लगी थी। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि चिकित्सक ही गंभीर स्थिति में मरीज को आईसीयू में बेड नहीं होने का हवाला देकर निजी अस्पतालों का बकायदा नाम बता रवाना कर देते हैं। निजी अस्पताल में जाने के बाद मरीज की जान बचे या न बचे कमीशन की राशि उन्हें ईमानदारी पूर्वक मिल जाती है। एंबुलेंस चालक, दलाल सभी गरीब को नोच-खसोट कर मालामाल हो जाते हैं।

कार्रवाई नहीं होने से हौसले बुलंद :-
निजी अस्पतालों में मरीजों और उनके स्वजन जांच, ईलाज के नाम पर सिर्फ बिलिंग का शिकार होते हैं। सुबह हुआ नहीं कि इन पर रुपये जमा करने के लिए दबाव बनाया जाने लगता है। मरीज को भर्ती करते समय जमा कराए जाने वाले हजारों रुपये किस काम में व्यय किए गए, इसका हिसाब देने वाला कोई नहीं रहता है। ऐसे कई मामले समाचार पत्रों के माध्यम से सामने आने के बाद भी अभी तक किसी अस्पताल संचालक पर विधिसम्मत कार्रवाई नहीं हुई है। मरीज की मौत के बाद रुपये नहीं होने की स्थिति में रुपये के अभाव में शव नहीं देने को लेकर हंगामा भी हो चुका है। गंभीर स्थिति में भर्ती मरीज के स्वजनों से पैसा ऐंठने के चक्कर में इलाज के बजाए इन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है। मामला बिगडऩे या किसी मरीज की मौत होने पर अस्पताल के संचालक ही नहीं एजेंट भी सक्रिय हो जाते हैं और मरीज या मृतक को आनन-फानन में या तो रेफर कर देते हैं या गांव-घर भेज देते हैं। पीडि़त पक्ष पर राजनीतिक दबाव बनाने जैसा प्रयास भी किया जाता है ताकि मामला रफा-दफा हो जाए। देखना यह है कि स्वास्थ्य मंत्री के जिले में नियम विरुद्ध संचालित हो रहे निजी अस्पतालों पर कार्रवाई कब होगी।  

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