-सुनील दास

कोई आदमी हो, कोई परिवार हो, कोई राजनीितिक दल हो वह जीतता तब है जब उसमें जीत का जज्बा होता है, जीतने का उत्साह होता है। सीएम से लेकर सामान्य कार्यकर्ता में जीत का एक सा उत्साह होता है कि हम ही जीतेंगे। जब कोई सोच लेता है कि हम जीतेंगे तो वह उसके लिए मेहनत भी करता है। जब भाजपा तीन बार जीत चुकी थी और कांग्रेस तीन बार की हार की निराशा में डूबी हुई थी तो भूपेश बघेल को कांग्रेस की बागडोर सौंपी गई थी। तब भूपेश बघेल में निराशा में डूबी हुई कांग्रेस में जीत को जो जज्बा नेता के रूप में पैदा किया था, वह जज्बा वह न तो वह विधानसभा चुनाव मेंं कांगरेस में पैदा कर पाए, न ही लोकसभा चुनाव में कर पा रहे है।

विधानसभा में मिली जीत से सीएम विष्णुदेव साय उत्साह से भरे हुए हैं और पूरे प्रदेश का दौरा कर राज्य में सभी ११ सीटें जीतने के लिए नेताओं व कार्यकर्ताओ में जोश भर रहे है्ं। वह जानते हैं कि कांंग्रेस को जीत का मौका देने का मतलब है कि कांग्रेस को लौटने का मौका देना है। यही वजह है कि वह कहते हैं कि जीत तो हम रहे हैं आप लोगों को जीत के अंतर को बड़े से बड़ा करना है।सोमवार को बृजमोहन अग्रवाल ने अपना नामांकन दाखिल किया उसके बाद हुई सभा सीएम ने भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं से कहा कि रायपुर से भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल की जीत आठ लाख से ज्यादा मतो से होनाी चाहिए। इसी तरह दुर्ग से भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल की जीत के लिए उन्होंने कहा कि जीत छह लाख से ज्यादा मतो से होनी चाहिए। सीएम साय अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं से कह रहे है कि जीत तो हम रहे हैं, जीत को शानदार बनाने की जरूरतहै। इसके लिए कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।

होता यह है कि जब किसी दल के नेताओं व कार्यकर्ताओं को लगता है कि हम तो जीत रहे हैं वह जीत के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करते है्ं। जीत का जज्बा किसी दल में सबसे बड़ा नेता ही पैदा करता है। यह काम पीएम मोदी ने तो तीन चार माह पहले शुरू कर दिया था। उन्होंने पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं आश्व्स्त कर दिया था कि जीत तो इस बार हम पक्का रहे हैं। आप लोगों को जीत को ऐतिहासिक बनाना है, इसके लिए उन्होंने भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को ३७० का लक्ष्य दे दिया और एनडीए के लिए चार सौ पार का नारा दे दिया। एक नारा किसी पार्टी मे कितना उत्साह पैदा करता है, इसे मोदी के दिए नारे से समझा जा सकता ह

पीएम मोदी ने पूरे देश के भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को जीत को जो लक्ष्य दिया है, उसे पूरा करने का काम स्थानीय संगठन व नेताओं का है, यह काम साय छत्तीसगढ़ में बिल्कुल उसी तरह कर रहे हैं जिस तरह केंद्र में पीेएम मोदी कर रहे हैं।कांग्रेस में राहुल गांधी नेता जरूर है लेकिन वह न तो विपक्ष में जीत का जज्बा पैदा कर सके हैं न ही अपनी पार्टी में जीत का जज्बा पैदा कर सके हैं। एस सीट के लिए भूपेश बघेल को चुनाव लड़ाने का फायदा क्या हुआ यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन एक सीट तक ही भूपेश बघेल के सिमट जाने से ऐसा लगता है कि राज्य में कांग्रेस का कोई नेतृ्त्व करने वाला नहीं है, कांग्रेस को कोई जिताने वाला नहीं है। महंत ने शुरू में  कोशिश जरूर की लेकिन उसके बाद वह भी कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। सिंहदेव क्या कर रहे हैं इसका कुछ पता तो मीडिया से चलता नहीं है।

इससे साफ संंकेत मिलता है कि कांंग्रेस इन दिनों बिखर रही है।कांग्रेस नेता अपने परिवार के लोगों तक को अपने साथ नही रख पा रहे है्। भूपेश बघेल की भाभी का भाजपा में शामिल होने का मतलब तो लोग यही निकाल रहे हैं कि भूपेश बघेल जब परिवार को कांग्रेस में रख नहीं पा रहे है तो वह कांग्रेस को क्या एकजुट रख सकेंगे। एक हार के बाद कांंग्रेस में बिखराव शुरू हो चुका है। दूसरी हार के बाद यह बिखराव और तेज हो सकता है। कांग्रेस को कैसे कमजोर करना है यह साय व मोदी की जोडी जानती है। अब जब तक यह जोड़ी है तब तक कांंग्रेस का मजबूत होना बहुत ही मुशिकल है।

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