दतिमा मोड़/सूरजपुर(अनुप जायसवाल)- दिहाड़ी मजदूर और बेरोज़गार आज अपने अधिकारों की मांग कर रहे है, उनके प्रति राज्य सरकारें जो अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल कर रही है उसमें उनके अधिकारों की बात नही की जा रही है उनके प्रति दया और संवेदनाए जताई जा रही है। इस महामारी से लड़ने के लिए हमे एकजुटता की बेहद जरूरत है, 25 मार्च को जब लॉक डाउन की घोषणा की गई थी उसके बाद लाखो की तादाद में दिहाड़ी मजदूरों ने पैदल ही अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान करना शुरू कर दिया था फिर दुबारा जब 14 अप्रैल को लॉक डाउन बढ़ा कर 3 मई तक किया गया तब सूरत, बांद्रा के स्टेशन पर लाखों दिहाड़ी मजदूर घर जाने की मांग में वहाँ एकत्रित हुए, हालांकि वही कोटा में फसे विद्यार्थियों के लिए बसे का इंतज़ाम किया गया है पर उन्हें दया की मंसा से नही आंका गया, उनके अधिकारों पर सबका ध्यान केंद्रित था, हालांकि दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सरकार और हरियाणा की सरकार ने बसे का इंतज़ाम जरूर किया पर शायद वो उतना सफल न हो सका। एकजुटता के जरिये हम इस लॉक डाउन को सफल बना सकते है और लॉक डाउन को बढ़ाने को लेकर राज्य सरकारों द्वारा भीषण मांग भी की जा रही थी लेकिन क्या दिहाड़ी मजदूरों के आँशु और सामुदायिक द्वेष से हम इस लॉक डाउन को सफल बना पाएंगे या फिर यह लॉक डाउन विफल हो जाएगा।

दिहाड़ी मजदूरों के प्रति संवेदना क्या इस लॉक डाउन को सफल बना सकता है मेरे हिसाब से नही वो इसलिए क्योकि दया, करुणा और देखभाल, नैतिक रूप से भावनाओं के रूप में हो सकते हैं पर मौलिक रूप से यह संवेदनाए एकजुटता से संबंधित नहीं हैं। हम दुख व्यक्त क्यू कर रहे है जबकि दिहाड़ी मजदूरों के प्रति हमे दुख व्यक्त ही नही करना चाहिए, वो इसलिए नही करना चाहिए क्योंकि इस लॉक डाउन में दिहाड़ी मजदूरों को उनकी जरूरत की चीज़ें मिलना तो उनका मौलिक अधिकार है और अगर कोई तबका इससे अछूता है तो उसके साथ अन्याय हुआ है और अगर उसका एक भी क्षण दुख में बिताता है तो वह यही दर्शाता है कि सरकारे और सरकार से जुड़े तंत्र पूर्ण तरीके से विफल हुए है। एक तरफ ये भी कहा जा सकता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश मे लोगो तक उनकी मूल जरूरतो को पहचानना मुश्किल है पर जो लोग मूल जरूरत को इकट्ठा करने के लिए अपने घरों से निकल रहे है वो सिर्फ इसी आस में निकल रहे है कि उन्हें दो वक़्त नही कम से कम एक वक्त का तो भोजन मिल जाये पर जो चित्र सामने उभर कर आ रहे है वो कुछ और ही बयां कर रहे है।

तो एक न्याय-आधारित एकजुटता एक अलग सवाल पूछेगा ? यह नहीं पूछेगा की भुखमरी या सामाजिक अशांति से बचने के लिए हम न्यूनतम क्या कर सकते हैं? सवाल यह है कि इन परिस्थितियों में राज्य का क्या दायित्व है? राज्यो का दायित्व संवदेना जताना नही बल्कि दिहाड़ी मजदूरों के अधिकारों पर गौर करना है और जो मूल रूप से गरीब है उन्हें आधार कार्ड और राशन कार्ड के फेर में उलझा कर रखना तो वैसा ही हुआ जैसे आज अमेरिका के राष्ट्रपति अपनी जनता को राहत की आमदनी प्रदान करने में इसलिए देरी कर रहे है क्योंकि उन चेक्स पर राष्ट्रपति ट्रम्प अपना नाम लिखवाना चाहते है, जितनी देरी और कागज़ी फेरबदल में हम फसे रह गये उतना ही लोगो का विश्वास राज्यतंत्र की व्यवस्था से उठता चला जायेगा, और एकजुटता की शक्ति कम होती जाएगी इस महामारी से लड़ने में।

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