चंचलेश श्रीवास्तव

सूरजपुर। जिले में इन दिनों एक गम्भीर बीमारी लग गई है। दरअसल यह बीमारी होती राजनेताओं में होती है पर यहां अधिकारियों को लग गई है, वह बीमारी है छपास रोग की। छपास रोग भी ऐसी की प्रतिस्पर्धा हो जैसें। किसका कितना बड़ा छपता है। जिस बीमारी से राजनेताओं को ग्रसित होना चाहिए वे यहां बौने है और उन पर अधिकारी हावी है। यह नेताओ की समस्या है कि वे बौने रहे या ना रहे, पर हम बात जिस रोग की कर रहे है वह कोई बुरी बात नहीं है।अच्छा काम है कुछ छपना चाहिए, जनता को पता लगना चाहिए कि कुछ हो रहा है। लेकिन जिले में अच्छा हो क्या रहा है। शहर गांव गली से जो खबरे छन कर बाहर आती है। वह उन छपास रोगी अधिकारियों को तमाचा से कम नहीं है पर गुनाह बे लज्जत साहब तौबा……। जिले के दूरस्थ बिहारपुर क्षेत्र में जिले के अधिकारियो की ऐसी आमद रफ्त हुई की पूछो मत, चार पहिया वाहनों के काफिलों से लेकर बस तक की सवारी कर यहां पहुंचा गया। जिससे ऐसा लगने लगा था कि मानो यहां कुछ दिनों के लिए जिला मुख्यालय बन गया हो। मुख्यालय में अधिकारियों का टोटा हो गया था। जिले के वो तमाम जिम्मेदार अधिकारी वहां कई कई दिनों तक डेरा जमाए रहे और हल चल ऐसी पूछो मत, एक बार तो लगने लगा कि वर्षो से अपनी जड़ जमाये नासूर बन चुकी क्षेत्र की मूलभूत समस्या तो अब हल हो ही जाएगी। मगर सड़क, पुल पुलिया, बिजली और पानी जैसी वो जरूरते लोगो की पूरी नहीं हो सकी जिसका दंश वर्षो से क्षेत्र के लोग झेल रहे है। इन समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई पहल हुई हो यह अब तक तो प्रतीत नही हुआ है। बस पेंशन, राशन कार्ड तक समाधान सिमट कर रह गया जो अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है। यहां तो आलम यह है कि पेशी में आये ग्रामीण भटकते रहते है और उप तहसील में ताला लटकता रहता है। ऐसा दावा किया गया गया है कि जिले में दो सौ से ज्यादा जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित किये गए, इनमे करीब 80 जनसंवाद कार्यक्रम ऐसे थे जिसमें मुखिया साहब खुद मौजूद रहे और लोगो की समस्याओं का झाडूमार अंदाज में समाधान किया गया, कहाँ हुआ यह तो स्थिति देखकर समझा जा सकता है। जिले के दूरस्थ अंचल की बात छोड़िए जनाब मुख्यालय से महज 6 किमी की दूरी पर एक दिन पूर्व लगे संवाद कार्यक्रम में समस्याओ की ऐसी झड़ी लगी जो दिया तले अंधेरा साबित कर गया। पानी की समस्या पर जब एक ग्रामीण ने ध्यानाकर्षण करा निजाद दिलाये जाने की मांग की तो बताया गया कि एक से डेढ़ साल में नल जल के माध्यम से हर घर मे पानी पहुंचा दिया जाएगा। क्या बात है साहब तब तक क्या ग्रामीण प्यासे रहे। जिला मुख्यालय के दफ्तरों का आलम यह है कि बिना चढ़ोत्तरी के कोई काम हो जाये यह सम्भव नहीं है। मुख्यालय के अस्पताल में अव्यवस्था कहे या फिर दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। वर्षो से रिफर सेंटर रहा अस्पताल जिला अस्पताल बनने के बाद आज भी रिफर सेंटर बना हुआ है। इमरजेंसी में पहुंचे लोगो को प्राथमिक उपचार भी समय पर मिल जाए तो मान लीजिये वो बहुत बड़ा भाग्यशाली है। वार्डो से लेकर शौचालय व परिसर में फैली गंदगी शोभा बढ़ा रही है। मुखिया जी के दफ्तर से महज चंद मीटर की दूरी पर स्थित इस अस्पताल की ही अगर सुध ले ली जाए और व्यवस्था दुरुस्त करने की दिशा में पहल हो जाती तो जिले के लोगो को बेहतर स्वस्थ लाभ मिल सकता। लफ्फाजी व भाषण बाजी में पारंगत महोदय सत्ता पक्ष के नेताओ तक को अपनी राजनीति चमकाने के मौका नहीं दे रहे है। जिससे नेता बिचारे बन कर रह गए है और यह कहते सुने जा रहे है कि जिले की दोनों अनारक्षित सीट से दोनों अधिकारी चुनाव लड़ने की तैयारी में अपने आप को चमकाने में लगे है ताकि टिकट की दावेदारी में कोई कसर ना रहे,,,। हाल यह है कि जिन्दे लोगो को रिकार्ड में मार दिया जा रहा और फिर उसे जिंदा करने जांच की बात कही जा रही है। अब जांच किस बात की होगी कि वह मरी या मरा क्यो नही या जिंदा कैसे है। जब वह खुद कह रही है कि में जिंदा हूँ तो उसके राशन पानी की व्यवस्था करिए।जांच करते रहिएगा। जिले के बच्चों को वन क्लास अधिकारी बनने के लिए इन दिनों भविष्य दृष्टि युवा सृष्टि कार्यक्रम चलाकर सफलता का मंत्र दिया जा रहा है। जिसमे जिले के अब तमाम बच्चे अफसर की राह पकड़ लेंगे। क्या वह किसान जिसके मेहनत की बदौलत हम अन्न ग्रहण करते है या व्यापारी व समाज सेवक प्रेरणास्रोत क्यो नहीं हो सकता। हम यह नही कहते कि बच्चो को दिशा देना गलत है पर बच्चो के रुचि को जानकर दिशा दिया जाना चाहिए। ताकि वे रुचि के हिसाब से अपना भविष्य तय कर एक सफल इंसान बन सके कुछ को किसानी की दिशा में आगे बढ़े। जिले में शिक्षा का स्तर कैसा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्कूल में अध्ययनरत बच्चो को प्रदेश के मुख्यमंत्री और जिले के कलेक्टर तक का नाम पता नहीं है। 50 हजार रुपये का वेतन पाने वाले शिक्षक निजी स्कूलों में 8 से 10 हजार रुपये का वेतन पाने वाले शिक्षकों से अपने बच्चो को पढवाते है,,,। इस बार ऐसा लग रहा है कि जिले में पहली बार ठंड पड़ रही है ऐसा नहीं है जनाब ठंड पहले भी पड़ी थी और इसके बाद भी पड़ेगी। इस बार क्या नया है पर गरीबो की मदद आबादी से ज्यादा होने लगा है जिसे देखो वही कम्बल बंटाते दिख रहा है सबकी चाहत है कि अखबार में नाम छप जाए पर कोई यह नही बताता की इतने गरीब अचानक आ कहा से गए। कहीं ऐसा तो नही की इन कम्बलों का उपयोग किसी ओर काम मे करने के लिए किया जा रहा हो। प्रदेश के साथ जिले का तार भी यूपी से जुड़ा हुआ है और यूपी में चुनाव होने वाला है।दूसरा इन दिनों जिले में महिला, बच्चियों, वृद्धजनों के लिए तरह तरह की योजनाऐं चलाई जा रही है। इन योजनाओं का कितना फायदा संबंधितों को मिला है क्या जिले में महिलाओं व बच्चियों पर अत्याचार खत्म हो गया, क्या छेड़छाड़ व अनाचार का अपराध रुक गया। क्या पुलिस के द्वारा फरियादियो की समस्याओं को गंभीरता से लेकर राहत देने कोई सार्थक पहल बिना किसी लाग लपेट के किया गया।अबतक तो ऐसा देखने या सुनने में नहीं आया है। कथित गांजा तस्करी के मामले को लेकर पुलिस के परिजनों पर ही अत्याचार के विरोध में दो जवान खुले आम सड़क पर लातम जुता करते दिख रहे है और मामले में एक आरक्षक पर हत्या का प्रयास जैसा गंभीर धारा लगाकर जेल भेज दिया जा रहा है। एक युवती को छेड़छाड़ जैसे मामले में न्याय के आभाव में आत्महत्या करना पड़ रहा है तो गांजा तस्करी का फरार आरोपी खुले आम अपनी राजनीति चमका रहा है और उसको पकड़ने में पुलिस के हाथपांव फूल रहे है। सालभर से एक युवती गायब है परिजन न्याय की गुहार लगाते घूम रहे है। बुजुर्ग महिला की जमीन हड़प ली जाती है मामले में दोषी अधिकारी कर्मचारी को बचा लिया जाता है। यही नही शासन की एक इकाई कलेक्टर के निर्देश पर जांच में दोषी पाए गए लोगो पर मामला दर्ज करने के लिए आवेदन देता है जिस पर अपराध दर्ज करने में लालबत्ती जलने लगती है। मामले में क्या मजबूरी है कितना और किसका दवाव है यह तो वे ही जाने। स्थिति का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर कोई थाना चौकी में रिपार्ट लिखाने पहुंच गया तो जीभ ऐसे लपलपाने लगती है। मानो आ गया ग्राहक। बगैर चढ़ोत्तरी के रपट तक नहीं लिखी जाती।इस पर सोचते इसमें बदलाव होता तो लगता कि जिले में कुछ बदला है छपता तो बात अच्छी लगती पर इसे देखने के लिए चश्मा उतराने की जरूरत है। अभी जिस छपास रोग से पीड़ित है उससे जिले को फायदा तो नही है पर पुरूष्कार की गारंटी जरूर है ले लीजिए यह जिले का भाग्य है कि हम वहीं के वहीं रहंगे आपकी तरक्की हो जाये। जिले में खुशी होगी थोड़ी ठंड से राहत आपके बेगर कम्बल के मिल जाएगी।
जय हो ….बाबा .ढोलकिया नाथ की….

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