पुस्तक अनेक भावनाओं का संगम है, जो मन को सच्चाई से रूबरू कराती है – गीता द्विवेदी

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अंबिकापुर – नगर की रहने वाली गीता द्विवेदी लेखिका होने के साथ साथ एक योग्य शिक्षिका भी हैं। इन्होंने अपनी काव्य कृति के माध्यम से समाज के सभी पहलू को उकेरा ही नहीं वरन उन भावों को भी सबके सामने लाने का भरपूर प्रयास किया है। समाज में चल रही गतिविधि कवियत्री के अंतर्मन के भावों को जब झंकृत कर देती है, तब एक कविता संघर्ष करने हेतु उठ खड़ी होती है। इनकी रचनाएँ राष्ट्र के पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपती रहती हैं।

गीता द्विवेदी की पहली काव्य कृति ‘अनुभूति’ है, जिसका विमोचन इनके पैतृक ग्राम में हुआ और उससे जो कवियत्री को आत्मीय ख़ुशी प्राप्त हुई है, उसका वर्णन उन्होंने अपने प्रक्कथन में व्यक्त की है। गीता द्विवेदी अपने प्रक्कथन में आगे लिखती हैं कि साहित्य के क्षेत्र में साहित्यकार को प्रोत्साहन से आत्मबल मिलता है। उन्होंने माना है उनकी साहित्यिक यात्रा में, “मेरे परिवार के साथ और प्रेम का महत्वपूर्ण योगदान है”।

‘अंतर्मन के कोने से’ पुस्तक अनेक भावनाओं का संगम है, जो मन को सच्चाई से रूबरू कराते हुए पवित्र कर देती है। पुस्तक का मुख्य आवरण अपने अंतर्मन के भावों को बिखेर रखा है। विलुप्त हो रहे सोनचिरैया के लिए कवियत्री का व्याकुल मन इसी बात को दर्शाता है। इस कृति में निहित रचनाएँ छंदमुक्त हैं।

जहाँ एक ओर ‘किस्मत का सितारा’ के माध्यम से नई पीढ़ी को समझाने की कोशिश की है कि सत्कर्म हीं उन्हें उज्ज्वल भविष्य प्रदान कर सकती है। वहीं दूसरी ओर ‘ज्ञान के फूल’कविता में बच्चों को ज्ञान से जोड़ने की कोशिश है। भक्ति रस में डूबी कितनी कविताओं के विभिन्न रंग हैं जो विभिन्न परिस्थितीयों में इनके लेखन की क्षमता सिद्ध करतीं है। ‘कान्हा के दर्शन को’ में कान्हा के लिए विचलित मन, ‘नास्तिक’ कविता में कवियत्री आश्चर्यचकित हैं कि जब उन्होंने अपने अंतर्मन में ईश्वर को देखा है तब वह नास्तिक कैसे ? इसलिए ‘खोल बावरी पट स्वगृह का’ में अपने मन की द्वार खोलकर ईश्वर को बिठाने की बात कही है। जिसकी ‘सोचो जरा’ के माध्यम से पुष्टि होती है।

‘नादान मानव मन फिर भी उसे खोजता फिरता है वो तो मन गलियों में हर क्षण विचरण करता है’
गीता जी की कविता ‘सीता का प्रकृति प्रेम’ और ‘आज की सीता’ में, युग बदलता है लेकिन सीता और इंसान नहीं, और ‘बाबा तुम काहे ना आए’ में बेटी को पिता के लिए तडप और ‘चार कोने की दुनिया’ शादी के पश्चात रीति रिवाज के बोझ का घुटन समाज में एक स्त्री की मनोस्थिति को दर्शाता है। ‘पीड़ा अंजान रास्ते की’ में मृत्यु का अनुभव दर्शाया है तो ‘सजा’ में दिवार पर टंगी शिकारी की तस्वीर और शिकार के सर से जरूरत और मनोरंजन करने वालों का विरोधाभास बाखूबी उकेरा है।

‘तुमने तो मार डाला हमें, दीवारों पर सजा दिया,
इसकी तुमको किसने सज़ा दी, हमारे साथ हीं सजा दिया’

देश प्रेम के भाव की अनुभूति ‘सरहद’ में, और ‘नालायक बेटा’ में इनके अंतर्मन में चल रहे असीम प्रेम और दर्द को प्रस्तुत करती है। ’अंतर्मन के कोने से’ पुस्तक रूपी दर्पण है जो हमें कवियत्री की अनेक भावनाओं से साक्षात्कार कराती है।

पुस्तक का मुद्रण गुणवत्ता अद्वितीय है। पृष्ठों की साज सज्जा पाठक को अवश्य अपनी ओर आकर्षित करेगी। पुस्तक आकर्षक होने के साथ साथ समयानुकूल लिखी गई है, जो पाठक को संतुष्ट करेगी। विभिन्न रंगों को अपने अंतर्मन में समेट कर यह पुस्तक एकल काव्य धारा के रूप में अंतर्मन में अपना आशियाँ बना रही है। ‘अंतर्मन के कोने से’ में एक कवियत्री के अंकुरित होकर पल्लवित, फलित होने की अनुभूति है। ‘अंतर्मन के कोने से’ साहित्य जगत के अंतर्मन में एक अलग पहचान बना पाएगी ऐसी मैं आशा करती हूँ।

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