राजेंद्र ठाकुर (राजू )ब्यूरो कार्यालय बलरामपुर 

बलरामपुर कुसमी विकासखंड के दुर्गम भैसापाठ गांव में एक बुजुर्ग महिला को इलाज के लिए झेलंगी के सहारे करीब दो किलोमीटर तक नदी नालों को पार कर मुख्य सड़क तक पहुंचाने का मामला सामने आने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग भी सवालों के घेरे में आ गया है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने और समाचार प्रकाशित होने के बाद जिम्मेदारों में खलबली मची और स्वास्थ्य विभाग की ओर से सफाई जारी की गई।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि गांव तक पहुंचने वाली सड़क खराब होने और नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण बड़े वाहनों का आवागमन संभव नहीं है। विभाग ने यह भी दावा किया कि इस दौरान मरीज के परिजनों द्वारा 108 एवं 102 एंबुलेंस सेवा अथवा किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता से संपर्क नहीं किया गया।
लेकिन सवाल यह है कि मूल खबर आखिर थी किस बारे में?
वायरल वीडियो में ग्रामीण युवक साफ तौर पर गांव की सड़क की स्थिति और पुलिया के अभाव की बात करता दिखाई और सुनाई देता है। वीडियो में स्वास्थ्य विभाग से संपर्क नहीं करने या एंबुलेंस नहीं बुलाने की बात का कोई उल्लेख नजर नहीं आता। ऐसे में समाचार सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा अपनी सफाई में एंबुलेंस और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मुद्दा उठाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
अगर सड़क खराब है नाले पर पुलिया नहीं है और बड़े वाहन गांव तक नहीं पहुंच सकते, तो यह बात स्वयं स्वास्थ्य विभाग के बयान से ही साबित हो रही है कि दुर्गम गांवों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच किस स्थिति में है।
विभाग ने यह भी बताया कि मरीज के परिजन निजी वाहन से झारखंड के महुआडांड़ स्थित अस्पताल लेकर गए, जहां उसका उपचार जारी है। यहां भी स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों को बेहतर और भरोसेमंद इलाज की सुविधा मिल रही होती, तो परिजनों को मजबूरी में दूसरे राज्य के अस्पताल का रुख क्यों करना पड़ता?
भैसापाठ की तस्वीर सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मजबूरी नहीं दिखाती, बल्कि यह दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुलिया और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच के उस फासले को भी उजागर करती है, जिसकी जिम्मेदारी से विभाग सिर्फ परिजनों का संपर्क एंबुलेंस से नहीं का हवाला देकर बच नहीं सकता।
विकास की सड़क पर सवाल उठा तो स्वास्थ्य विभाग ने एंबुलेंस का रास्ता दिखा दिया, लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा है जब गांव तक पहुंचने वाली सड़क और पुलिया ही बदहाल है, तो आपात स्थिति में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था आखिर कितनी दूर तक पहुंच पाएगी?
ऐसे में भैसापाठ का मामला एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को सामने ला रहा है। कहावत है खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा आठ आना। भैसापाठ मामले में स्वास्थ्य विभाग की सफाई पर यह कहावत पूरी तरह सटीक बैठती नजर आ रही है।

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